जितिया

जितिया

३६६ दिन अगाडि

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२९ भदौ २०८२

गजलः डस्या आ गिल जसिन लग्ठा

गजलः डस्या आ गिल जसिन लग्ठा

३६६ दिन अगाडि

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२९ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                         फोटुः भरतविक्रम शाह दिलबहादुर चौधरी  जब अङ्ना म डौना ओ बेबरी फुलल डेख्टुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा जब बठ्न्यावन झौँ झौँ पैयाँ लागट डेख्टुँ ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा हो भारी संस्कृति ब्वाकल् हमार थारु जात, नाचगान म रमिता  कर्ना जब चक्डाउ चक्डाउ मन्ड्रा बाजट सुन्ठु ट  डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा डिउँटावन छाँकिबुंडी डेहक लाग डारु बनइना,  हमार  पुरान  रिति   हो  जब डाइहँ गुम्रक डारु जोटाइल डेख्टुँ ट डस्या  आ गिल् जसिन लग्ठा चाडबाडके ब्याल म हमन थारुन हँ सिढ्रा, मच्छी अनिवार्य चहठा जब मामा घरक् माइ हँ सिढ्रा सुखाइ्ट डेख्ठुँ ट  डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा आब डस्या आइ्टा लौव लुगा लगाइ पैम कना, म्वार खुसिके  सिमा नि रह जब डज्र्याव डसिहाँ जरावर सियट डेख्ठुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा कैलारी गाउँपालिका–५, कैलाली  हालः रानीवन, काठमाडौं २०८२ भदौ २८ गते, ठुम्रार साहित्यिक बखेरी अंक १०८ मे जुमसे वाचन करल रचना  

सिध्रा  

सिध्रा  

३६९ दिन अगाडि

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२६ भदौ २०८२

हम देखैले चियै कारी लेकिन हमर काम छै गुणकारी हमर अकार छै गोल  हम घुमै चियै टोलेटोल हमर रूप रङ नै छै लेकिन हमरा खाइले कोइने छोरैछै मुह कान नै छै हमर छनगर  लेकिन हमरबिना कोइने रैहसकैछै हरदम यी समय हमर चियै हम चियै सिध्रा । आसिन, कात्तिक चियै हमर मैहना कचु, तोरीके साग या डेरहना, पोठी माछके  सुकठिसे बनल चियै हम पैहले त कचु काइटके अइसलाइछै तेकरबाद डेरहना पोठी माछके सुकठि भटभटके ढेकीमे कुइटके गरदा बनाइछै तेकरबाद अइसलेलहा कच्चु कुटैत कुटैत अधखुजुवा हैछै ताव कुटलाहा सुकठि कच्चुमे मिल्याके  मिहिन कैरके कुटैछै ताब लोदिया बन्याके थोइपके गोल अकार दैछै  बिचमे भुङरा करैछै ताब हम बनै चियै । दुई, चार रौद सुख्याके कैटकामे गाइथके घुरी बाइन्हके हमरा रौदमे  हनहनके सुखाइछै । हम टहटह रौदमे हनहन सुइखके  ट्ट्याके, मोइरके जैरके उठैचियै हासैत खिलखिल्याके  । हमरा गुइरके, भुइथके  आइगमे भुजैछै  हमर देह परपर डहैछै लेकिन हम स्वाद दैले नै छोरै चियै  हमरा भन्टा, मुरै सङे भुइजके पाइनके झोर दैछै आइगमे खदखद खदकै चियै हम हमरा धिपल लागल कैहके हम  हल्ला नै करै चियै बरू स्वादिस्ट गन्हाइत सबके नाकनाकमे पुगै चियै  हमरा शुकराइतके बगियामे अगहनमे उसना भातमे माघीमे चुरा, मुरहिजरे खाइछै । हम थारूसबके स्वादिष्ट परिकार चियै सुकराइतके बगियाके जोरी चियै हमर मुह कान नै छै लेकिन हमर गन्हसे एक थारी बगिया, चाइर थारी भात या  दुई सुपा चुरा मुरहि खाइछै लोकसब । हम ढेकीके माइर सहलियै टटैहिया रौद सहलियै आइग, धिपल पाइन सहलियै  सिझहलियै, पाकलियै, गललियै नोन,बुकनी मेरचाइके करू सहलियै तेकरवाद हम सैबके मनमे बैठलियै ।  जे जतहेक सङ्घर्ष करै छै ऊ ओतहेक अगारी बरहैछै जे जतहेक समस्यासे कुटल,पिसल जाइछै ऊ ओतहेक कामयाब हैछै जे जतहेक  जोतल, पिटल जाइछै ऊ ओतहेक हीरा जेखा चम्कैत  सैबके मनमे बैठै छै । ============= सिध्रा (नेपाली भाषामा) म हेर्न कालो छु तर, मेरो काम  छ गुणकारी मेरो अकार छ गोलो तर,  म घुम्छु  टोलैटोल मेरो रूप रङ नै छैन तर,  मलाई खान कसैले छोड्दैन मुहार मेरो  सुन्दर छैन  तर मबिना कोही पनि  रहन सक्दैन हरदम यो समय मेरो हो  म हुँ सिध्रा । आसोज, कात्तिक हुन्, मेरा महिना कर्कला, तोरीको साग र डेरहना, पोठी माछाको  सुकुटिले बनेको छु म पहिले त कर्कलो काटेर घाममा  ओइलिन दिन्छ त्यसपछि डेरहना पोठी माछाको सुकुटि भ्यातभ्यात ढिकीमा कुटेर धुलो बनाउँछ  ओइलिएको कर्कलो कुट्दा कुट्तै सुकुटीको धुलो  मिसाएर मिहिनले कुट्छ डल्लो  बनाएर  थोप्छ गोलो अकार दिन्छ बिचमा प्वाल पार्छ  त्यसपछि बन्छु म ।  दुई, चार घाम सुकाएर सिन्कामा हालेर डोरीमा बाँधी मलाई  टन्टलापुर घाममा सुकाउँछ  घाममा सुकेर चाउरिन्छु म  मर्न मात्र सक्दिनँ तर, घामले डढ्छु यति हुँदाहुँदै पनि म उठ्छु हाँस्दै  । मेरो जिउ टुक्राटुक्रा पारेर धुलो बनाउँछ आगोमा भुट्छ, मलाई आगोले पोल्छ मेरो जिउ  डढ्छ तर, म स्वाद दिन छोड्दै छोड्दिनँ पानीसँग आगोमा उम्लिन्छु गल्छु तर, मलाई पोल्यो भनेर कहिले भन्दिनँ जति गल्छु त्यति धेरै मिठो हरहर वास्ना दिँदै सबैको नाकसम्म पुग्छु ।  म तिहारको बगियामा मङ्सिरको उसिना भातमा माघीको चिउरा, मुरहिसँग खाइन्छु । म थारू जातिको स्वादिष्ट परिकार हुँ तिहारको बगियाको जोडी  हुँ मेरो अनुहार  छैन तर, मेरो वास्नाले एक थाल बगिया, चार थाल भात र  दुई नाङ्लो चुरा मुरहि खान्छन् मान्छेहरूले  । मैले सहेँ ढिकीको कुँटाइ सहेँ टन्टलापुर घाम  डढेँ आगोमा झेलेँ उम्लिरहेको तातो पानी आगोमा पाकेँ, फतक्क गलेँ सहेँ नुन र धुलो खुर्सानीको पिरो  त्यसपछि बल्ल म बसेँ  सबैको मनमनमा । गर्छ जसले जति सङ्घर्ष   बढ्छ ऊ अगाडि त्यति  जो जति समस्यासे कुटिन्छ पिटिन्छ  ऊ चढ्छ त्यति सफलताको शिखर, जो जति  जोतिन्छ  ऊ त्यति  हीराझैँ चम्किँदै बस्छ सबको मनमा । अनुवादः कवियत्री स्वयम् सिरहा, नेपाल, हालः पोर्चुगल

हामी सबै नेपाली  

हामी सबै नेपाली  

३७६ दिन अगाडि

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१९ भदौ २०८२

                                                                                                                                                                             तस्विरः एआइ कोइलीलाई हेला किन भनी काली काली ऊ त मीठो गीत गाउँछे भाका हाली हाली कागलाई हेला किन भनी काली काली ऊ त खबर बोकी ल्याउँछे पखेटा है हाली औंसी रातलाई हेला किन भनी काली काली जुनकीरीले उज्यालो छर्छे बत्ती बाली बाली बहिनीलाई हेला किन भनी काली काली समयमै होमवर्क गर्छे, छैनन् पाना खाली  माली दिदीलाई हेला किन भनी काली काली फूल दिन्छिन् हामीलाई भर्छौ डाली डाली किन गर्छौ रंगरूपमा हेला, तिम्रो मनै जाली  गोरी हौं या काली, हामी त सबै नेपाली ।  लमही नपा–४, दाङदेउखुरी हालः कीर्तिपुर–५, काठमाडौं साभारः नेबासास प्रतिनिधि नेपाली बालकविता, २०८२

चौठिचान

चौठिचान

३८० दिन अगाडि

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१५ भदौ २०८२

दुर दुर तक सुनसान छै अकाश केकरोले रूकल छै धरती धरती चानके देखैले असियाल छै सुरूजके लाजसे नै निकलै छै चान आइ चानके बरी हतार छै ऊ सुरूज डुगैके इन्तजारमे छै । सुरूज चानके देखैले रूकल रूकल थाइक गेलै नै निकललै चान (चाँदनी) थाकल सुरूज चैले गेलै आराम करैले तेकर वाद निकललै चान   चान धरती दिसर ताकलकै या धरती चान दिसर ताकलकै देखलकै धरती चानके शान्त, सुन्दर मुह । चान देखलकै धरतीमे धरतीवासी सब अङ्नामे  चौका बनाइने छेलै दिनभोइर निवाला व्रत वैठके चानके देखैले असियाल छेलै, माइटसे निपलाहा चौकामे कन्तरामे दही, खिर, तेलपौर, रोटी केरा, स्याऊ फलफूल थारी भोइरके राखने छेलै अकाशमे चानके देखते मातर सबकोई खुसी हैत  चान दिसर अौङरी देखाइत कहैले लागलै देख चान निकललै, चान निकललै ..... धरतीवासी सब तेलपौर रोटी, दही चानके चरहाइले असियाल छेलै अकाशमे चानके देखैत मातर दिनभोइर निवाला व्रत बैठल भक्तालु चानके सरर या अगरवतीकृ धूप देखाइले लागलै दहीसे भोरल कन्तरा, तेलपौर रोटीसे भोरल थारी हाथमे बोकलकै चानके पूजा करलकै तेकरबाद चानके दही, रोटी, फलफूल चरहाइलकै । चान दिसना देखैत मनेमन धरतीवासी सब, कोइ कौबला करैछेलै कोइ कौबला करने छेलै से पूरा भेला पर चानके धन्यवाद कहैछेलै कोइ गाई, माल चौपाया सब दिन स्वस्थ रहे  सेके कामना करैछेलै  कोइ घरपरिवारके सुख, शान्तिके कामना करैछेलै कोइ सन्तान या परिवारके सैब सदस्यके  कुशल स्वस्थ जीवनके कामना करै छेलै । चान खुसी हैत सबके दही, रोटी चाखलकै सबके मनके बात सुनलकै  सबके मनोकामना पूरा करलकै   आपने जेखा  बनैले सिखाइलकै अन्धकार हटाइले सिखाइलकै असगरे पूरा अकाश या पूरा धरतीमे चम्कैले सिखाइलकै । लहान न.पा. १२, भोटियाटोल, सिरहा, हालः पोर्चुगल