आइल थारूनके बर्का टिउहार माघी

आइल थारूनके बर्का टिउहार माघी

२४६ दिन अगाडि

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२८ पुष २०८२

बाबा

बाबा

२४९ दिन अगाडि

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२५ पुष २०८२

जिन्गिक हरेक मोरमे टुँ महि सडा कुछ सिखैटि गैलो मै सिख्टि गैलुँ  मोर अंग्रि पकरके महि टाटे टाटे कैके पाइला सारक सिखैलो मै सर्टि गैलुँ जब महि निंड नैआए टे टुँ खिस्सा ओ काठा सुनाके निड्वाओ महि टोहार खिस्सा ओ काठा सुन्टि बर्हटि गैलुँ © बाबा टुँ मोर गल्टिक  कबो पर्वाह नैकैके सच्यइटि गैलो ओ हमेसा मोर सुख डुःखमे  साठ डेलो मोर सपना पुरा करक लग डिनराट नै समझके  भुखे प्यासे कामेम डँट्टि रलो मोर सक्कु इच्छा ओ चाहना बुझके महि जहिया फेन हौस्यइटि रलो  मोर इच्छटप्रटि टोहार यि हौसला  मैया ओ श्रेयले मै आघे बरहे सेक्ले बटुँ बाबा सेक्ले बटुँ डुइ चार अक्षर कुछ लिखे महि अभिन फेन याड बा टोहार सिखाइल ककहरासे जिन्गिमे पहिलो चो आपन नाउँ लेखक सिख्ले रहँु ओ सेक्ले बटुँ यि जिन्गि जिए सायड आझ टु नैरटो टे यि मोर डुन्याँ मै कल्पना फेन करे नैसेकम बिल्कुल कैयाँ कुचिल अन्ढकारमे बिटट ओ बरा मुस्किलले बिटट यि डिन, महिना ओ साल उहेमारे बाबा मै टुहिन कैसिक संग्या डिउँ टुँ परिवारके हो छट्रछायाँ टुँ जाट्टिसे डोसर डाइ  गर्व बा टोहार छाइ हुके टब्बे टे बाबा फुरे मै सडा रिनि रबुँ टोहार प्रटि ।   लमही नपा–४, छुटकी घुम्ना,  देउखर दाङ, हालः काठमाडौं साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक (साहित्यकार कृष्णराज सर्वहारी विशेषांक) वर्ष–८, अंक–१, पूर्णाङ्क–२९, २०७३ (माघ, फागुन ओ चैत)  

हर हाल मे जिन्दा रह

हर हाल मे जिन्दा रह

२५० दिन अगाडि

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२३ पुष २०८२

चाहे कुछो भि हौक हर हाल मे जिन्दा रह मरै से पैहने नै मर जियै से पैहने नै मर खूद के खूद से नै हर आत्मसम्मान माइर के  जीते जी तुँ नै जर । नै कोनो नशा के कुलत  नै निराशा के लेल मोहलत  नै ककरो से उम्मीद कर नै खूद से उम्मीद छोड तुँ जिन्दा रह, तुँ जिन्दा रह, हर हाल मे जिन्दा रह ।।  आपन क्षत विक्षत हृदय मे खूद से मलहम लगा आपन भग्न चित्तविथि से करिया अन्हैरिया रंग के हटा तुँ बोधिचित्त के बिया चिही खूद के दिव्य प्रकाश से भर । दिशा आ दशा के पहिचान कर तुफान त कहियो ओराइबे करतै हर हाल मे नाह के खेवैत रह हर हाल मे तुँ जिन्दा रह खूद अपने आप के साथ आपने देह के हर साँस के साथ तुँ जिन्दा रह, तुँ जिन्दा रह, हर हाल मे जिन्दा रह ।। तुँ जिन्दा रह, हर हाल मे पढ लिख कुछ नयाँ सोंच, कुछ कर नयाँ नयाँ सिल्प नयाँ ज्ञान देख कुछ नयाँ सपना कर तद अनुरुप साधना सिरजन कर कुछ नयाँ विसर्जन कर मोह माया  कुछ नयाँ जाँच कुछ नयाँ परख हर हाल मे चलैत चल   अपमान सहैल परतै त सह,  छति सह आ हर दुख कष्ठ सह किन्तु फेनो खोज नयाँ डगर,  नयाँ जगह मे खरही गाड खडा कर फेनो नयाँ गहबर लेकिन तुँ जिन्दा रह, हर हाल मे जिन्दा रह ।। तुँ जिन्दा रह, जिन्दा रह बाहर, जिन्दा रह भितर अइ दुनियाँ के रंग विरंग से आपन मन पसन्द के रंग चुइन के विन्दास से खूद के भर  शान्ति से भर अपना के उम्मिद से भर आपन सपना के खुश रह, जिन्दा रह करुणा से भर, मूदिता से भर मैत्री से भर, उपेक्षा से भर समानुभूति से भर, सत्यनिष्ठा से भर भर हर झोली साँस से, सुख छै ओकर संजीवन जिन्दा रह, रह कुशल मंगल जिन्दा रह, बहाइत रह निरन्तर  अमृतधारा प्रेम अकिञ्चन ।। (निट्ठाह) सप्तकोशी नपा–१, फत्तेपुर, सप्तरी हालः साज, बाहिया, ब्राजिल २२ अगस्त २०२५

उ डिन फेन आइटा आब

उ डिन फेन आइटा आब

२६१ दिन अगाडि

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१२ पुष २०८२

रूमा चौधरी हमार जिन्गिक लावा अध्याय सुरू हुइटा आब  हम्रे सफलतक पहाड उचियइना डिन आइटा आब  हम्रे आजसम हमार डाइ बाबन्के नाउँमे बहर्ली पौंह्रली आब हमार डाइ बाबनहे हम्रे सहेर्ना डिन आइटा आब ।   डाइ बाबा बहुट दुख कस्ट कैके बढैलाँ पढैलाँ  ओइनके लगाइल रिन टिरना डिन आइटा आब  हमार सफलतक लग कट्रा ढेर सपना डेख्ले हुइही  डाइ बाबनके उ सपना पुरा कैना डिन आइटा आब ।   डाइ बाबा हमार ओजरार भविस्यक लग अपन खुशी ट्यागल हुइही  उ त्याग ओ समर्पन समझके आगे बढना डिन आइटा आब  डाइ बाबा हमार खुशीक लग हरेक चिजमे बहुट महत्व डेहेअस ओइनके इच्छा चाहनाहे महत्व डेके खुशी बनैना डिन आइटा आब ।   आजुक मेहनत, लगनशिलता काल्हिक भविष्य कटी  डाइ बाबा लर्कनके कमाही खैना दिन आइटा आब सब दुख कस्ट हेराके सबके मुहेम मुस्की विल्गना  उ डिन फे आइटा आब, उ डिन फे आइटा आब ।   राप्ती गाउँपालिका–८, पिपरी, दाङदेउखर हालः कक्षा १२, गोरखा सेकेन्डरी स्कुल, लमही

सत्तक भन्सम सिकार क बास 

सत्तक भन्सम सिकार क बास 

२६२ दिन अगाडि

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११ पुष २०८२

बौराइ अस बह भिरल कौर्यारम किउ नि फन्कि किउ ओम का पानी आपन हुइ परट नि कहि जब बह्र्या घट लागि जब बाझ भिरहिँ पखै ओ जालम सौँरि सक्कु ज आपन आपन खोजहिँ हिस्सा किउ कहि लड्य ह आपन बाबक बिर्टा किउ कहि पानी ह आपन पुर्खक बिर्टा किउ कहि मछ्छि ह आपन बिर्टा पटा बा महासय, खेट्वम किउ नि सरुइया हो हाँठ–ग्वारा किउ नि करुइया हो ढुर्याढुनम काम  किउ नि फँकुइया हो झौह्वक ग्वाबर जब धान फरि सक्कु ज खोजहि हिस्सा  सक्कु ज खोजहि अधिकार पटा बा महासय, किउ नि पलुइया हो छेग्रा किउ नि बह्रुइया हो खोँर्वा  किउ नि कटुइया हो घाँस, झाला किउ नि पनुइया हो छेग्रा किउ नि फर्चुइया हो काठि किउ नि रिझुइया हो सिकार  जब मग्मगाइ भिरि भिट्टर भन्सा सक्कु ज ख्वाज लगहि आपन बठा इहाँ हर क्रान्ति ओ परिवर्तनम एक्ज रठ पस्ना ओ रकट बहुइया जब सत्तक भन्सम सिकार क बास आइट और रठ ड्वान डोसुइया ओ बठा पउइया ।    बर्दिया, आबः काठमाडौं