शर्मिला चौधरी
बाट २०६१ साल ओरिक हो । फुलक बौँरा अलाजल फैलके डलबाडर छाँइल गेट । भिट्टर पहँटि–पहाटके ढारल गमला, गमलामे जगमगरारे फुलल फुुला बरे सुहावन बिल्गे । डेलवा असक झङ्भङ्यार, मजोरपङ्खि असक कजर्यार, फुलाले सजाइल अँगना ओ घोट्टैलसे रंगरोगन लागल सोहावन घर । चारूओर डेवाल घेरल; झिरखि मारल गेट, भिट्टर फुलरिया; अइसिके सुन्डर ठाउँमे फुलझरियक संसार रहिन । मनो, बाहेरके डेस डुनियाँ कुछ पटे नै रहिन । खँढराके कर्याइल चिरैं हसक । बगालमे सामेल हुइना, किहुसे भेटघाट करना सिहनि मुइ ।
ढुस्मुस सक्करहिँ उठ्ना; हाँठेम सिट्ठा लेके सक्कुओर झार बहार कर्ना । गँछ्वै–गँछ्वै भाँरा ढोइना, रास लागल लुग्रा ढोइना फुलझरियक रोजडिनिक काम रहिन । कबु–कबु आँग–मुरि पिरैलेसे फेन ‘नाहिँ’ कहे नै पैना ओहकार हालट रहिन ।
फुलझरियक किस्नान घर पाँच जाने परियार रहिन । मलिकवा, मल्किनियाँ, डुइ छावा ओ एक छाइ । मलिकवक छाइ–छावा हहराइँट, हुडहुड हुडहुड यहोंर डौरिँट, खेलिँट । बिचारि फुलझरिया पँजरेहें डुठाहा भाँरा ढोइन, रास लागल लुग्रा ढोइन ओ आउर आउर काम करिँट । हहरइना, खेल्ना ओहकार एक घरिक सँपार नै रहिन ।
एक डिन फुलझरियक मलिकवा, मल्किनियाँ, छुट्कि छावा ओ छाइ सबजे आपन–आपन काममे घरसे बाहर गइल रहिँट । घरेम सिरिफ मलिकवक बर्का छावा हरि ओ फुलझरिया किल रहिँट ।
ऑजर पाँजर सुनसान, चार डेवालके बिचमे सिर्फ हरि ओ फुलझरिया किल रहिँट । अक्केलि घरेम हरिक मन कुलबुलाइ टहिस् । फुलझरियक अङ्ठा हसक जगजगाइल बैस, फुला असक फुलल रूप, जोन्ह्याँ जइसिन मुहाँर डेखके हरि लल्च्याए । ओज्रार ओकर रुपरंग डेख्के खुबसे लोभाए । घर सुनसान रहल मौका पारके हरिक मनमे का का पाप खेले लग्लिस् । फुलझरियक लोभलग्टिक रुपमे उ सुन्डर सपना बिने लागल । फुलझरियक बैस फुलल फुला लोह्र्ना डाउँ ढारे लागल । अस्टे अस्टे सोँचट सोँचट ओकर जिउ माने नै लग्लिस् टे हरि ओपन कोन्टिक भिट्टरसे गोह्राइल ।
–“ए फुलझरिया ! ए फुलझरिया !”
बाहेर गमलामे पानी डरटि रहल फुलझरिया बोल्लि –“का कहटो डाडु ?”
–“एक गिलास पानी लिएर आइजा !”
फुलझरिया –“अब्बे डाडु ! आइ गइनु पानी लेके ।”
सफा मनके फुलझरिया, जाट्टिके एक गिलास पानी लेके हरिहे डेहे आ गइलि ।
हरि पानीक सङ्ग फुलझरियक हाँठ पकरल । गिलासक पानी टेबुलमे ढरटि हाँठ पकर लेहल । हरि कहे लागल
–“गिलासको पानी हैन । आज तैंले मेरो मनको प्यास मेटाउनु पर्छ ।”
अट्रा बाट सुन्टिकिल रिसाक माटल फुलझरियक आँगके भुटला खेख्नार होगइलिन । उहिन फेन बल्जबरै लागे लग्लिन, उ ठरठर–ठरठर लग्लगाइ लग्लि । टोंटा सुखा गइलिन; ठुक अँटक गइलिन । टोंटा रुढल असक भिट्टरसे बोल निकरलिन् –“छोर ! डाडु टैँ यि का करटे ?”
–“किन छोड्ने ? आज म तँलाई कुनै हालतमा पनि छोड्दैन ।”
फुलझरिया झिट्करटि, आपन हाँठ निप्चैना बल लगाइटिहि ओ रोइटि बोल्लि –“छोर ! नै कि टे चिल्लाइटँु ।”
–“चिच्याए पनि यो पर्खालभित्र कोही पनि सुन्ने छैन, आउने हैन ।”
हरि फुलझरियइहे जलजब्रै घिस्यइटि आपन पठरिमे लइगिल । उ फेरसे कहल “तँ आफ्नो जीवनमा आनन्द लिनै पाइकी छैनस्, आफ्नो यो फूल जस्तो जवानीको रस चाख्नै पाएकी छैनस् होला ! म आज आनन्दले स्वाद चखाउँछु ।”
फुलझरिया, झिट्टा मरटि बोल्लि –“छोर ! छोर ! मैं भागटुँ ।”
हरि फुलझरियक उल्टे एक एक लुग्रा उटारे लागल । डेंह–डेंहमे चुमे लागल । कोल्काहा ठाउँमे छुए लागल । फुलझरिया आपन जिन्गिमे पहिलचो मरडके छुवाइ लेके आढा बेहोस् हो गइलि, आढा डिमाक हेराइल असक सोंचाइ हु गइलिन ।
हरि जबरजस्टि डबोट लेहल । अइसिन हाल डेख्के फुलझरियइहे आपन संसार लुटल हसक लग्लिन । छिनभरमे लिरोठे बैसमे करखा घाँस डेहल । फुलझरिया विचारिक डर ओ लाजके मारे बोल ओल ओरा गिलिन ।
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