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निंनके खोजि

    –हेरि महासय यि सुड्ढ साकाहारि होटल हो । सर्वहारी मनैन्के खैनाहस कौनो सरभङ्गि होटल नैहो । यहाँ जुर चाय टे मिल्बो नै करठ ।
निंनके खोजि

अकेलि डेरम बैठ्ना कट्ना कर्रा । उहि अर्ठाट् कुमारहे जिन्गिम सबसे अल्छि लग्ना कलक खाना बनैना हुइस ।

डसिया डेवारिक बिचेम ओकर परिवार देउखर बटिस । उ बा अकेलि काठमाडौँ कीर्तिपुरिक डेरम । भलमन कलवा टे बना लेहठ, बेरि निंढ्ना कर्रा । 

उ सोच्ले रहे, परटेक बरसहस मामक् छाइक् डेरा सातदोबाटो भाइटिका लगाइजैम, एक डुइ डिन ओस्टे कट जाइ । मने मामक् छाइ याने कि डिडि फेन देउखर घरे गैल रहिस । 

डिन कटैना कर्रा परल बेला प्रसादु भाइक् फोन अइलिस डेवारि मन्ना । डिनभनर प्रसादु भाइक् डेरम सिताराम, अजित लगायट संघरियनसे तास खेलल् । कुल ३ सो ७० रुपिया हटल । सन्झाके सितारामके डेरम घरमडिया पियल । सुरिक सिकार खाइ छोरलमे फेन खाइक सुरु करडेहल । खाइट पियट बरे राट हो गैलिस । अपन डेरम गैल, मुख्य डवार लगाइल रहिस । बस् सुटे चलगैल प्रसादुक डेरम ।

उहि आनक् डेरम निन नै पर्लिस । डेखल प्रसादु ओ हुँकारसंगे आइल अजितहे  ससन मसन सुटल । खै का ख्याल अइलिस । भिन्सहरि मोर्निंङ वाक करेहस प्रसादुक् डेरमसे निकर गैल । उ बिहान, भाइटिकाक् बिहान २०७३ कार्टिक १७ गटे रहे । पाँगा दोबाटो आइल । अइसेबेर पट्रपट्रिका पुगुइया, कलेज जउइया लर्का फाटफुट बिल्गिट । मने आझुक बिहान टे भाइटिकाके डोसर बिहान रहे । एक टे टिउहार माने बहुट मनै घरे घरे गैल रहिंट, यहाँक् नेवार फेन कोइ उठल नै रहिँट । 

आझुक बिहान टे भाइटिकाके डोसर बिहान रहे । एक टे टिउहार माने बहुट मनै घरे घरे गैल रहिंट, यहाँक् नेवार फेन कोइ उठल नै रहिँट । 

एक डुइठो कुक्कुर यहोर ओहोर लखर लखर करटिहिट । नैटे पाँगा दोबाटो चोक मसान हस सुनसान रहे । उ एकफेरा अपन डेरक चक्कर काटल । मेन गेट अभिन खुलल नै रहे । बस चलडेहल त्रिवि कीर्तिपुर परिसर ओर । यहाँक गान्धी भवनके आगे सामुहिक योग उ कुछ महिना कैले रहे, आज यहाँ फेन सुनसान रहे । उहाँक बालकुमारी खाजा घरेक पन्ज्रे, चाय पसल बा । चार्ली च्याप्लिनके नन्हे नाकक् फोंघेटिर किल कुच्चसे मोंछ पल्ले होटलिया बुढ्वा खिटहर फेन बा । आज उ फेन डोकान नै खोल्ले हो । कुमार उहे चाय पसलके बेन्चम् ढ्यान मु्ड्रामे बैठल । ओ कच्से निडा गैल ।

ओहोर बिहानके ९ बजे ओर उठ्लाँ प्रसादु भाइ । अफिस नै रलक ओर्से गुड्रि ओर्हले पला रहलाँ । गाँर गुडगुडाइ लग्लिन टे ट्वाइलेट गैलाँ । उहाँसे आके हेर्ठा टे ना कुमार डाडुहे डेख्ठाँ, ना टे अजित भाइहे । आ अपन डेरम गैल हुइहि अस्टे अनुमान लगैटि बर्बरैलाँ, मने जाइबेर एक अख्रा टे कहक चाहि, जाइटुँ कहिके ।

चार डिनके वाड प्रसादुक मोबाइलेम कुमारके जन्निक फोन घन्घनैलिस– भइया टोहार डाडु कहाँ बटा ? फोन ओन स्विच अफ बटिन ।
    –खै भौजि डेवारि एक डिन टे सँगै मनैलि ।
    –एकफेरा डेराओर अहटा लेहे जैहो टे भैया । मै टे डराइटुँ । पिके यहोर ओहोर सुट्ना बान बटिन ।
    –ठिक बा भौजि, मै पटा लगैम । 

अट्रा कहटि फोन ढर्ला । आब पर्लिन् प्रसादुहे कर्रा । डेवारिक बाड आज उ पहिला फेरा अफिस जाइ टहिँट । ओहेसे फेन अफिस ढिल हुइटिहिन । डिनके फेन भौजिक फोन आइ सेकठ कैहके कुमारके डेराओर सोसो फोफो डौरलाँ । घरबेटिसे पुछँला– ‘खै कुमार दाजु हुनुहुन्न ?’

 –खोइ उसको त के ठेकान । भाइटिकाको बिहानै गएको । त्यसपछि देखेको छैन । घर पो गयो कि ?

घरबेटिक ओइसिन जवाफले कुमारके डेरक टाला खेलाके प्रसादु चल अइलाँ । अफिस आके सुस्टैलाँ । कुर्सिम् बाउँ कोटक गोझु बैठेबेर गरे हस लग्लिन । छम्लाँ टे भेटैला कुँजि । यि टे मोर कुँजि नै हो । कहाँसे आइल ? फेन डोस्रे छम्लाँ टे भैटैलाँ पट्याइल कागट । खोलके हेर्ला । लिखल रहे 

प्रिय जुनुक डाइ,
    मै डेरमसे कहुँ जाइटुँ । निनके खोजिमे । कहोँर जाइटुँ, महि स्वयम् पटा नै हो । मोर बेड टेबुलमे एकठो खिस्सा लिख्के छोरल बा । मझलि छाइ बुनुहे टायप करे कहिके नागरिक दैनिकमे पठाइ कैह डेहो । 
    गोरखापत्र थारु भासा पेज फेन बुनुहे बनाइ जाइ कहि डेहो । गोपसे कुँवार अंकके पारिश्रमिक लानके काम चलैहो । नै पुगि टे नाफा, नक्सालमे पहिले रिसर्चके काम कैलक १५ हजारके चेक बनल हुइ । उ फेन लाने सेक्ठो । सुशील चागो (गोचा) से ५ हजार डस्या मन्ना सापट मँग्ले रहुँ । मंग्हि ओंग्हि कलेसे अपने आके डिहि कैहडेहो ।
छुट्कि छाइ भूमिकाहे ना गरियइहो । लिहुरके काम कैलेसे टोहार कुब्बर बठाइठ, अपन ख्याल  करहो । मोर ख्याल करे नै परि । कबु जबु याड आइ टे एल्बम बिल्टैहो । 
ओहे टोहार पिहवा
कुमार

चिठिक् भिट्टर छोट्नक टुक्रा फेन रहे । जेम्ने लिखल रहे–‘प्रसादु भाइ, यि चिठि ओ डेरक् कुँजि अपनिक भौजि डेवारि मानके आइ कलेसे डै डेवि ।’ 

पिएचडि कैके मनै बौरैठाँ कहठाँ । डाडु फेन पिएचडि बुझाके बौरा गैलाँ कि का ? भौजिक नाउँमे अइसिन चिठि लिखके हेराँ गैलाँ । ढट्टेरि कि ।’

चिठिक् बेहोरा पर्हके प्रसादु भाइ बर्बरैलाँ–‘डाडुक कौनो अफिस फेन नै रहिन् । बिन्डास हस घुमिँट । पिएचडि कैके मनै बौरैठाँ कहठाँ । डाडु फेन पिएचडि बुझाके बौरा गैलाँ कि का ? भौजिक नाउँमे अइसिन चिठि लिखके हेराँ गैलाँ । ढट्टेरि कि ।’

ओहोर त्रिवि कीर्तिपुर परिसरके चाय पसलमे बैठल कुमार जब लागल टे अपनहे भेटाइल कलंकी चोकमे । उ डिन रहे २०६३ बैसाख ८ गटे । कीर्तिपुरसे कलंकी पुग्ना उहि ठिक डस बरस लाग गैल रहिस । 

कलंकी चोक पुरे जाम रहे । चारुओरसे मनैन्के सैलाफ् आइटेहे । गँरटन्त्र मुर्डावाड, लोकटन्त्र जिन्डावाडके नारा लागटेहे । एक पाँजरसे पुलिस रखेडिट, आन्डोलनकारि गुरगुरसे भागिट । फेन डोसर पाँजर मनैन्के खचाखच भिर । मनैन् अपन ज्यान जोगैना कर्रा रहिन् । मने कुमारहे भुँख लागटहिस । उ एकठो होटलमे छिरल । होटल पुरा सुनसान रहे । 

    –एक कप लेमन टि मिलि ?
    –मिल्ना टे मिलट । ग्यास ओराइल बा । आन्डोलनके मारे लेहे जाइ नै सेक्जाइठो ।
    –टबे टे जुर चाय बा कलेसे जुर चाय पिउँ कि ?
    –हेरि महासय यि सुड्ढ साकाहारि होटल हो । सर्वहारी मनैन्के खैनाहस कौनो सरभङ्गि होटल नैहो । यहाँ जुर चाय टे मिल्बो नै करठ । मने कबुजबु अपन पियक लाग घरमडिया ढैले रठुँ । अपनेक पियास डेखके एक गिलास डेहटुँ । आउर जनहन नो चानस ।

होटलिया डारुक संगे पुरान बिग्रल अचार फेन लान डेहल । ओहे बिचेम करिया चस्मा घल्ले एक युवा होटलमे पैठल । साहुसे मार्लबोरो सिक्रेठ माँगल । सिक्रेठ सुँगाके कुमार बैठल टेबुल सँगेक कुर्सिम् बैठ्के ढुँवा उराइ लागल ।

सहुवा कहल– ढुवाँ उरैना टेवल यहोर बा । उहाँ औरे ग्राहकहे डिस्टर्ब हुइहिन् ।

करिया चस्मा घल्ले युवक सहुवाहे टरेसे उप्पर हेरल ओ खिस्ससे हँस्टि कहल– ‘छोरो साहुजि । यि डेसमे का चिज व्यवस्ठिट बा ? जेहोर हेरो, टेहोरे लठालिंग बा । राजढानिक् जम्मा रेलिंग आन्डोलनकारि भट्का रख्लाँ । डेसके सबहस प्रहरी चौकी माओवादीन् भट्का रख्लाँ । अपने सिक्रेठ पिना अल्गे कोन्वक् बाट कर्ठि ? यहाँ डाडुन् कौनो डिस्टर्ब बा कि ?’
    –नाइ महि कौनो डिस्टर्व नै हो (कुमार आढा गिलास स्वाट पर्टि कहल) 
    –लेउ, हो टे गैल काहुन् । जब मिया बिबि राजी टो क्या करेगा पाजि, डुइ भाइन् कौनो ऐतराज नै हो । बेन उ डाडु पिटि रलक चिज महि फेन डेना हो कि ?
    –अपन लग किल एक गिलास बँचैले बटुँ, नै हो  ।
    –अरे छोरि साहुजि । अपने कौनो होटलमसे वाडमे जुगार कर्लेबि ।

सहुवा मन नै रटि रटि फे करिया चस्मावाले हे डरा डरा डारु डेहल । कारन होटलेम डिनेके अपन पिना डारु ग्राहक लोगन पिवाइट डेख्के जन्नि पटा पैलेसे गरुइया रहिस । 
    करिया चस्मावाले कुमारहे पुँछल– डाडु अपनके का कर्ठि ?
    –मै एक लेखक हुँ । उपन्यास, मुक्तक, खिस्सा अस्टे अस्टे लिख्ठुँ । पट्रिकामे कबो जबो लेखओख फेन लिख्ठुँ । 
    –वाह् लेखक । लि अपनेसे भेट होके बरा खुसि लागल (कस्के हाँठ मिलाइल) । मने टमान लेखक पत्रकार बटाँ । यि सस्सुर राजक् गुनागन गाके लिख्टि बटाँ । अपने फेन उहे लाइनसे टे नै हुइ ?
    –नाइ, नाइ । लेखक चाहे जौन सट्टाके विरुड्ढमे रहठ । लेखक सडावहार परटिपच्छि हो । आनक भजन गउइयन टे चाटुकार हुइट । 
    –वाह अपनेक बाट बहुट मन परल । लि इहे बहानामे एक एक प्याग आउर ठपि । (उ टोटफारे गोहराइल)  ‘साहुजि ?’

सहुवा आइल ओ कहल– डारु पियक माँगठुइबि, नै हो । वेन अपनेनके होटलमसे निक्रि । अब्बे नै टे आन्डोलनकारिन् नुकाइल कैहके पुलिस टंग करहि ।

ठन्चे पियलमे फेन भुँख्ले पेटेम लागल ओर्से कुमारहे घुम्रि लागे हस कर्लिस । आज्कल ब्लडप्रेसर हाइ होके फे चक्कर लग्ठिस ।

खै कइ रुपिया हुइल रहे । करिया चस्मावाले टिरल । ओइने होटलमसे बहिरियइँला । ठन्चे पियलमे फेन भुँख्ले पेटेम लागल ओर्से कुमारहे घुम्रि लागे हस कर्लिस । आज्कल ब्लडप्रेसर हाइ होके फे चक्कर लग्ठिस । उ ओठ्ठेहिं पेटिम बैठ गैल । जिन्डावाड मुर्डावाडके नारा लग्टि रहे । चस्मावाले उहे आन्डोलनमे गैल । हेर्टि हेर्टि उहि गोलि लग्लिस्, उ ओठ्ठेहे ढलगैल । कुमार बर्बराइल– जिन्गिक अट्रे टिकस कट्ले रहे बिचरा, सडाके लग निंडाइल काँहु ।

सन्झा कलंकी चोक कुछ फोंफर हुइल । कुमार खै निडाइक मारे कौन गारिम चौर्हल । उ अपनहे एकफाले गारिमसे उँटरके नेपालगन्ज जिल्ला प्रहरी कार्यालयके ठुनुवा कोठामे भेटाइल । यि २०६० साउन ७ गटेक बाट हो । कलंकीसे नेपालगन्ज पुग्ना उहि टिन बरस लाग गैल रहिस ।

उहि गैल सन्झा ओकर बाँके बगियास्ठिट अफिस युवा सोसाइटी प्रौढ शिक्षा सेवा मञ्चके अफिससे ओकर रेडियो उट्पाडन टिम सहिट पुलिस पकरके नन्ले रहिस । हमार सहिडान रेडियो कार्यक्रमके परमुख रहे उ । रेडियो नाटक उट्पाडनके कुछ सडस्य माओवादीक् आरोपमे पकरवा पाइलमे, बाट बनाइ गैलकमे उल्टे उ पकरवा पइले रहे ।

ठुनुवा कोठम मच्छरनके राज रहे । भुइयम् फलिया बिसाइल रहे । उहे फलियम नाउँ भरिक बिस्टारा रहे । ओंडरटि कि मुँस, छुछ्रुन ऐसा बोलिट कि जानो कानेम पैठ जैहि । बिहानसम सक्हुन्के आँखिम पट्टि बाँढल रहे । एक पुलिस कहल– हेर्दा खेरि पढे लेखको देखिन्छन् । तै कसो बुद्धि बिग्रेर माओवादी भएछन् सालेहरु ।

डोसर पुलिस बर्बाराइल –यिनीहरु मात्र हुन् र ? यहाँ सबका सब थारु माओवादी छन् । जाने भो यिनीहरुको जिन्दगी जेलमा सडेर ।

कुमार राटभर नै निडैलक मारे ठुनुवा कोठक् ट्वाइलेटमे पैंठल । डेखल बाहर पुलिस पिटि खेल्टि रहिँट । ट्वाइलेटके भिट्रेसे पिटि हेर्टि ठह्र्यैइले ठह्र्यैइले निंडा गैल ।

कुमार जब जागल, अपनहे देउखर लमही बजारके एक मेडिकलमे भेटाइल । उ बिहान रहे २०४४ सालके भाडो महिना । गटे बिस्रा गइल । एसएलसि टेस्ट परिच्छा ओरावाके उ लमही बजारमे जोरल गाउँ देउखर देउपुर धनबहादुरके घर पहुनाइ करे गैल रहे । धनबहादुर संघरिया टे कले रहिस, आज महुँवारि मन्के लाग गैल गोचा, काल्ह बिहान जैबि ।
    –नाहि । पियलमे साइकिल आउर जोर रप्टठ । मै चल्जैम संघारि ।

अट्रा कहटि किल कुमार लमही चौराहाके रातो डाँडासे खल्हाइबेर साइकिलसे गुरमुन्टि खेलगैल । बिहानके डाक्टर कहलाँ, अरे भइयु । बल्ले बल्ले बँचल बटि अपने । पाछेसे गाडि आइट कलेसे किचुलपोटा कैडेहट । लि एक अठ्वारके डवाइ लिख्डेहँटु । मने एकफेरा एकसेरा करा लेबि ।

उ खालि मुरि किल टौकाइल । 

डाक्टर कहलाँ– यि भइयुहे हिँकार घर सुरच्छिट पुगा डि । विचारा गैल राट मनके चोटा गैल बटाँ  । खुन्तुराम हेर्ला टे कुमारहे चिन्हे नै सेक्लाँ । गाल सुवाके मेंघवा हस रहिस ।

आदत डाक्टरके मेडिकलमे कुमारके परोसि काका खुन्तुराम डवा लेहे आइल रहिंट । डाक्टर कहलाँ– यि भइयुहे हिँकार घर सुरच्छिट पुगा डि । विचारा गैल राट मनके चोटा गैल बटाँ  । खुन्तुराम हेर्ला टे कुमारहे चिन्हे नै सेक्लाँ । गाल सुवाके मेंघवा हस रहिस । उ कहलाँ, ‘ठिक बा, लैजा डेम ।’

लमहीसे अर्नहवा, बनगाँवा, पत्थरपुरवा, गाउँ हुइटि साइकिल घुसल्लिक चढान घर जाके रुकल । उ कुमारहे ओकर कोन्टि सुटा अइलाँ । घर भरिक मन गरियइटिक गरियइटि । मझिल्का पियठ टे पिए नै जानठ कैहके ।

 कुमार सुट्टिक सुट्टि रहिगैल । एकफाले १४ बरस रहिके जागल । उ डिन रहे, २०२८ साल भाडो ६ गटे । ओकर बुडु निबुलाल लट्ठि ठोक्रियाक ठोक्रियाक पर्टि बहरिमसे मझेरि, मझेरिसे डेहुरार पुग्टि बर्बराइस्, सुरे सुर टे लर्का पैले बा  । एकजाने टे इहिहे डोरियइटि लागजाइ ।

हुइना फेन कुमार साटि महिनम जलमल ओर्से आँख खोल्ना कर्रा रहिस । डुढ पिलक फेन ओक्ला मारे । बिल्कुल बन्डारिनके बच्चाहस बरे पाटिर रहे  । मढरान सोर्हिन्या आजि सालनाल लग्गुक बारिम भँठ्लि । बच्चा डाइक कोनम आरामसे ढिरे–ढिरे सास लेहे लागल । एकडिन अस्टेक टे उ डाइक पेटेम निंडाइल रहे । डाइक कोखेम निंडैनासे मुलायम बिस्टारा कहाँ पो मिलि । यकरे खोजिमे टे उ अपन कीर्तिपुरके डेरमसे निक्रल रहे ।

उ डिन कुमार ४५ बरस २ महिना ११ डिनके बरि लम्मा नेगाइ नेंग्ले रहे ।

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इ खिस्सा आख्यानकार कुमार नगरकोटीके लिखाइ शैलीसे प्रभावित बा – खिस्साकार

साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक (साहित्यकार कृष्णराज सर्वहारी विशेषांक)
वर्ष–८, अंक–१, पूर्णाङ्क–२९, २०७३ (माघ, फागुन ओ चैत)

 

प्रकाशित:

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