लवकान्त चौधरी
नेपालके तराई क्षेत्रके आदिवासी थारु भिट्टरके कुम्हार समुदाय पुस्तौं पुस्ता से हस्तकलाके रुप मे बनैटि अइलक एक्ठो सृजना हो पिलरु।
आदिवासी कला सौन्दर्य के प्रेरणा किल नै हो। यि आपन गित के धुन में पुस्तौं पुस्ता से चल्टि अइलक ज्ञान, संघर्ष व पहिचान फेन बोक्ले रहठ।
पिलरुके ध्वनि में प्रतिरोध, पिडा व प्रेम के धुन गाउँ, लडिया, खोल्वा, बन्वा व घाँसक् डँरुवा मे गूँजे, जब आदिवासी थारु मनै घाँस काटे, गोरुभैंस चर्हाई व बनवा में बिहारे जाइँट।
लेकिन आझ, गैरआदिवासी संस्था व मनैं यि कला हे रचना करुइया व बचुइया हे कौनो फेन किसिम के श्रेय बिन डेहल व ओइन से अनुमति बिन लेहल उ कला के प्रदर्शनी कर्टि बँटा ओ कमैटि बँटा। ओस्टक थारु कला संस्कार हे आपन कला संस्कार के रूप में चित्रण कैटि सलिमा फेन बनैटि बँटा ओ प्रदर्शन कर्टि कमैटि बँटा।
थारु भिट्टरके कुम्हार समुदाय अभिन फेन बराबर के अधिकार, मान्यता व प्रतिनिधित्व के लाग संघर्ष करति बटाँ । जबकि ओइन के कला के चोरी हुइटिन, बेचबिखन हुइटिन व उ कलाके मूल भाव अर्थ के नाश कर डेहटिन। आदिवासी कला “मुफट मे लै लेना ” कौनो बस्तु नै हो।
जब गैर आदिवासी मनै आदिवासी शिल्प, ढाँचा, रीटि रिवाज वा खिस्सा के प्रयोग बिना अनुमति लेहल कैठाँ, खास कैके व्यापारीक फाइडा के लग टब उ पवित्र परम्परा हे एक ठो व्यापारिक सामान मे परिणत कैडेठाँ ।
पिलरु कौनु फेन किसिम के ट्रेन्ड नै हो।
यि टे इतिहास हो।
यि टे पहिचान हो।
यि टे प्रतिरोध हो।
सच्चा कदर कलक–
· आदिवासी कलाकार से प्रत्यक्ष रुप मे सहकार्य कैना हो।
· अनुमति लेना व संस्कृटिक रिटि नियम के सम्मान व पालन कैना हो।
· मूल रचनाकार हे श्रेय, पारिश्रमिक व पहिचान डेना हो।
अगर टुहिन आदिवासी कला मन परठ कलेसे उ मनैन हे फेन प्रेम करो, जे इहि हे बनाइठ व यकर मूल रचनाकार हो।
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