जब गोचाली सगुनहे २०३३ सालमे जेलमे छुटाइ गैलि...

जब गोचाली सगुनहे २०३३ सालमे जेलमे छुटाइ गैलि...

२१५ दिन अगाडि

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१३ पुष २०८२

भुलाई के मैथिली नै आबै छै

भुलाई के मैथिली नै आबै छै

२१९ दिन अगाडि

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९ पुष २०८२

भुलाई चौधरी २०२५/०२६ साल के बात चियै जब हम बिराटनगर के मोरंङ कलेज मे आई.एस्सी.मे परहैत रहियै वहै समय मे सप्तरी डिमन निबासी मीत भैया गंगाधर झा जे गजेन्द्र नारायण सिहं पार्टी के पार्टी प्रवक्ता रहै, ओकर सम्पर्क मे आईब के हमौ गजेन्द्र नारायण सिंह पार्टी से आवद्घ भ्या गेलरहियै ।  गजेन्द्र नारायण सिंह सप्तरी कोइलारी के निबासी रहै और उ पहिने नेपाली कांग्रेस मे रहै और जब वै पार्टी मे मधेसी प्रति कुछ विभेद देखल्कै त उ नेपाली कांग्रेस पार्टी से अलगे दोसर पार्टी खोलल्कै जे पार्टी वै समय मे गजेन्द्र नारायण सिंह पार्टी से परिचित रहै । एकदिन के बात चियै । गजेन्द्र नारायण सिंह के पार्टी के कोनो कार्यक्रम मे हमहुँ बाजलियै । अपना अनुभव भ्याल जे हम खौब नीक बाजलियै । मगर कुछेक समय मे प्रतिक्रिया सुने परलस गंगाधर झार मीत भैया बाजलै जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । सुइनके हमरा बहौत दुःख लागल । हम भैया के कहलियै जे भुलाई के मैथिली आबै छै कि नै, वै से कोन मतलब ? भुलाई चाहे आपने भाषा मे ने बाजेस बात त ई होना चाही जे भुलाई जे बाजलै उ ठीक बात चियै कि नै ? से बात त बाजवहक नै स बाजवहक केवल जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । यैठो मैथिली कते से येलै ?  वै दिन भैया, गंंगाधर झा के भाषावाला बात ल्याके हमरा बहौत दुस्ख लागल और हम वहै समय से गजेन्द्र नारायण सिंह के पार्टी छोइर देलियै । लगभग २०२९/०३० साल से थारु समाज मे सेहो थारु भाषा के संरक्षण, सम्र्बधन तथा विकासवाला चर्चा परिचर्चा बेसी हेबे लाग्लै । फलस्वरुप, २०३३ साल से महान्यायधिवक्ता श्री रमानन्द प्रसाद सिंह के प्रधान सम्पादन मे थारु संस्कृति परिवार के प्रकाशन मे थारु संस्कृति प्रत्रिका प्रकाशन हेबे लागलै । यैठो स्मरणीय बात ई छै जे उ पत्रिका थारु या थारु संघ संस्था संरक्षण केने हेतैै यै मे हमरा शंका लागैये । मगर बहौत मधेशी समुदाय सब वै पत्रिका के बहौत अंक सुरक्षित राख्ने छै ।  एक दिन हम कोनो काम विशेष से मीत विमल झा के घर राजबिराज मे गेल रहियै त गंगाधर झा/मीत भैया प्रकाशित भेलहा थारु संस्कृति पत्रिका के हरेक अंक देखे देने रहे आ तब वै दिन भैया गंगाधर झा फेन प्रतिक्रिया देने रहै जे भुलाई तुहँु सब मैथिलीये बाजै चहक । हमरा सब के बीच ई थारु भाषा सम्बन्ध मे छोट–मोट बहसो भेल रहे और हमर जवाफ रहै जे लगभग आई से १० वर्ष पहिने भैया वै दिन मिटिङ्ग मे तोहे ठीक बाजल रहअ जे भुलाई के मैथिली नै आबै छै । वै समय मे तोहर बात सुइनके हमरा रिस त रिसे उठल रहे । हमरा आशा रहे जे तोहे हमर कथन के समर्थन करवहक । मगर तोहे समर्थन कि करतियह रु उल्टे भुलाई के मैथिली नै आबै छै तै तर्फ बात के अलझ्याके  वहै ठाम हमर बात निर्मूल क्या देलहक । नतीजा ई भेलै जे हमरा तोहर सब के पार्टीये परित्याग करे परल । मगर फेन आई ई बात कते से येलै जे भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । येबकीवेर कि राजनीति छअ रु जे कहै चहक भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । ई त नै होना चाही ने । जब भुलाई कहे हम मैथिली बाजैचियै त तो कहक  भुलाई के मैथिली नै आबै छै आ जब भुलाई कहे जे हमरा मैथिली नै आबै छै त तोहे कहैचहक भुलाई तुहुँ मैथिलीये बाजै चहक । कोनो एक धार मे रह ने । सब बात तोरे सब के रु से आब नै चलतअ । थारु के ने कहियो मैथिली आबै छेलै आ ने अबैछै । सदैव वोकर मातृभाषा थारु रहै और अखुन्तो थारु के मातृभाषा थारु चियै । यै मे आब गलत  राजनीति नै चलतअ, कैहके वैठो से हम फेन आपन काम ले विदा भ्या गेलियै ।   सप्तरी, हालः पेप्सीकोला, काठमाडौं साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक, बरस ७, अंक ४, (कार्तिक–पुस) २०७३

थारू मातृभाषामा पत्रकारिताः अनौठो सन्तुष्टी

थारू मातृभाषामा पत्रकारिताः अनौठो सन्तुष्टी

२३२ दिन अगाडि

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२६ मंसिर २०८२

सन्तोष दहित न त कुनै दाम छ, न कसैको कर। न त निश्चित भविष्यको कुनै भरोसा। तर पनि,  रातदिन यही यात्रामा तन्मय छु। कहिलेकाही आफैलाई प्रश्न  गर्छु,  जानेर लागेको हुँ कि नजानेर ? तर उत्तर भेटिन्न। लेख्दा, टाइप गर्दा, सेटिङ मिलाउँदा समयको होशै रहँदैन। कहिले रातको १ बज्छ, कहिले भाले कुकार्ने बेलासम्म । भोलिको भविष्य के होला ? के खानु, के लाउनु, कुनै ठेगान छैन। तर पनि एउटा अनौठो सन्तुष्टि अनुभूति हुन्छ । यही काममा, यही समर्पणमा। आज लौव अग्रासन साप्ताहिक १८ औँ वर्षमा प्रवेश गरेको छ। यदि यो समय कुनै सरकारी सेवामा बिताएको भए, आज रिटायर्ड हुने बेला नजिकै पुग्थेँ होला। कम्तीमा बुढेसकालको साहारा त हुन्थ्यो। तर मिडियाको यस यात्रामा न आफूका लागि आधार बन्न सकें, न परिवारका लागि। यद्यपि, आत्मसन्तुष्टि भने प्रचुर छ । किनभने यो यात्रा अर्थका लागि होइन, उद्देश्यका लागि हो। थारू भाषा, साहित्य र संस्कृति संरक्षण तथा प्रवर्द्धनको ध्येय बोकेर सुरु गरिएको लौव अग्रासन १७ वर्षअघि एउटा सानो बीज थियो। आज त्यो बीज १८ वर्षको दृढ रुखमा परिणत भएको छ। रचनाकार र स्तम्भकारको अभावका बीच पनि पत्रिका निरन्तर छापिनु आफैंमा ठूलो उपलब्धि हो। आज डिजिटल प्रतिस्पर्धाको युगमा छापा मिडियालाई जोगाउनु सजिलो छैन। त्यसमा पनि मातृभाषामा पत्रिका चलाउनु त फलामको चिउरा चपाउनु जस्तै हो। न पर्याप्त थारू स्तम्भकार छन्, न थारू  भाषामा लेख्ने पत्रकार। विज्ञापन पनि लोककल्याणकारी भावना बोकेका सीमित स्रोतहरूबाट मात्रै। कहिले त्यो स्रोत रोकिएला, अग्रासन बन्द होला । त्यो पनि  थाहा छैन। तर यथार्थ जस्तो भए पनि, हाम्रा संकल्पहरू अटल छन्। हरेक चूनौतिको सामाना गर्दै  लौव अग्रासन साप्ताहिकलाई निरन्तरता दिनेछौं  । हरेक मंगलबार नयाँ अंक छाप्नेछौं, खोजमूलक सामग्री ल्याउनेछौं, छापासंगै  डिजिटल प्लेटफर्म www.agrasankhabar.com  मार्फत दैनिक रूपमा समाचार र सन्देश पुर्‍याइरहनेछौं। अन्त्यमा, यो सुखद अवसरमा हामीलाई अहिलेसम्म साथ दिने सम्पूर्ण मैगर कबिला,  लेखक, स्तम्भकार, पाठक, विज्ञापनदाता र शुभेच्छुक सबैप्रति हार्दिक आभार र कृतज्ञता व्यक्त गर्दछौं। र, लौव अग्रासन साप्ताहिकका सम्पूर्ण परिवारतर्फबाट १८ औं वार्षिकोत्सवको यस अवसरमा सबैमा हार्दिक बधाई र शुभकामना !

मेरमेरिक टलकिच्रन

मेरमेरिक टलकिच्रन

२३३ दिन अगाडि

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२४ मंसिर २०८२

                                                                                                                                                            लेखक मान बहादुर चौधरी “पन्ना” “इ टलकिच्रा लौरा कुछुबन लेह पठैबो ट कुछ टेख्बो नइकरट । उप्र ट्यारा रठिस । खोजखाज नइपर्ना, मजासे नइहेर्ना कहाँसे भेटाजाइ ? कहाँसे डेखि उन्ड्वा, उपरटेरी ।” इ कहाइ म्वार बाबक हुइटिन् । सायद उ ब्याला मै चार पाँच किलासम पह्रल हुइम ।  टलकिच्रा ठेट थारु भासक मौलिक शब्द हो । यकर शब्दिक अर्थ केराइबेर उन्ड्वा, चिप्रा, अकडेर्वा, डेख्टी डेख्टी फे नइ ड्याखलसक कर्ना, अर्थात् जरजर आँढर असक हो । जरजर आँढर कहबेर और मेरिक अर्थ लागसेकी । आँखीक आघक बन निडेख्ना, डेख्लसे फे नइडेखलसक कैक बहाना बाजी बनैनाह टलकिच्रा कैजाइट । थारु गाउँघर ओहर टिबोली मर्टी कहना शब्द फे हो इ । हमार गाउँम एकठो बन्टरान काका बाट । उहाँक सद्द आँखी टिरमिर रठिन् । निसोख्लक दिन नै निरठिन् । घरम काम करुइया जनशक्ति फे निहुइन् । भर्खर अर्ति कर जुकुर छोटछोट दुइठो छावा ओ एकठो छाइ बाटिन् । सक्कु काम जन्नीक भरम रलक कारन घरक धन्दा उसर्ना फे मुस्किल हुइठिन् । बन्टरान काका बाहरसे आइल ब्यालम गोरुबछरु, मुर्घी चिङ्ना, सुवर माकर चोच्चाइट डेख्ख खुब कल्कलैठ । “इ टलकिच्री जन्नी फे कहाँ मरगिल । बसेरा लेना जुन फे सुवर माकरिन ना खुद्रा डर्ल हो, ना मुर्घी चिङ्ना करैल हो । इ टलकिच्री टलकिच्रा लर्का फे एकठो काम फे नइडेख्ठ ।” हेरी पाठकवृन्द ! आफन उत्तरदायित्व निभाइक छोर्क जन्नी ओ लर्कन पर रिस उटर्ना इ बाबक बानी कसिन लागल ? “इ टलकिच्री जन्नी फे कहाँ मरगिल । बसेरा लेना जुन फे सुवर माकरिन ना खुद्रा डर्ल हो, ना मुर्घी चिङ्ना करैल हो । इ टलकिच्री टलकिच्रा लर्का फे एकठो काम फे नइडेख्ठ ।” मै आफन एकठो कहानी सुनैनास लागल । म्वार बनबनेट नैकुड्लक दशकसे ज्यादा होगिल रह कि का ? इ साल साउन महिनम गाउँक संघरेन सँग टावा काट जा गिलस् । गाउँसे करिब २ घन्टा पैदल न्याङ पर्ना बन्नोम निनेङ्लक ढेर दिनके बादम पुरान संघरेनसँग बन्वा जाइ मिल्लक ओहर्से लौव अनुभव हुइ कैक टावा कट्ना बहानाम जा गिल रह ।  जब बन्वाम पुग्ली, टब पानी फे महा जोरसे डर्कल । निकास लडिया भरिभराउ हो गिल । सबजन निकास लडिया टरक्ख गैगिल । मै फे टेक्नी पकर्ख टर्क टनहु । पठ्राम ग्वारा रपटगिल । झबाकसे गहिर ठाउँम अटक गैनु । सारा झुल्वा भिज्गैल । भिजल गिदारसक बन्वा ओहर लग्नु, टावा ख्वाज ।  सबजन कोइ कोहर, कोइ कोहर फरक फरक टारी नेङ्ल । मै अनसिख्वा मनै बरापुक मन्ह्ला छावासे  डख्खिन् ओहर  लग्नु । गाउँक संघरेन टावा चटाचट काट काट झ्वाला भराडर्ल । ओहोर मै जुन अक्को टावा नैडेखु । भर्खर निक्रल बाँसक टुसाम माटी लाग्खन कर्या कर्या ठेटकुरसक डेखु । मन्ह्ला डाडुह कनु– डाडु मै ट एक्को टावा नइभेटाइठुइटु जे ।  डाडु कल– “अरे भाइ कसिन ट नैडेख्ठो, टलकिच्रासक ।”  हजुर मै ट एक्को चिन्ह निसेक्ठु कनु । ऊ दिन बरा मुस्किलले दु तिन किलो टावा काट्गिल हुइ । बरापुक छावा आफन काटल टावा थपडेल ट ठनिक सुहैना भरिक हुइल ।   छोटम मामा घरक एक्ठो घटना याद आइल । मै कभुकाल मामा घर जाउँ । एकदिन अस्टह मकै निकाइ ब्याला हो । ममान घरक छुट्की माइ मामक पर गराइ लग्ली । गरैलक कारन का रह कलसे मामा मकै निकाइ व्याला भर्खर फर भिरल बोरी बुट्टा काट मर्ल काहु ।  माइ कल्कलाइटलही–“इ उन्ड्वा थारुक ढन्ढा अस्ट रठिन् । टलकिच्रा ट होगिल । हेरहार पार परठ । आँखिक आघ फर भिरल बोरी कट्ना । इ मनैन टिना रिझाइ व्याला का रिझाउँ कबो ।”   कौनो कौनो जन्नी मनै आफन ठरोक नाउँ टलकिच्रा ढर्ल रठ ट कौनो थारु मनै आफन जन्नीन्के नाउँ टलकिच्री ढैल रठ । इ ट हुइल घरायसी मामला, हजुर । हमार देशम टलकिच्रनके जमात जोहर फे बट । गहिर्ख अध्ययन कर्बी कलसे राज्यक हर निकायम टलकिच्रा भेटैबी । प्रशासनिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक हर क्षेत्रम टलकिच्रनके कमी निहुइट । आजकाल हमार थारु समाज लगायत और समुदायम आफन धर्म संस्कृति छोर्ख, और क्रिश्चियन धर्म मान भिरल बाट । हुइना ट धर्म निरपेक्ष देशम धार्मिक स्वतन्त्रता बा । हर मनैन आपन इच्छा अनुसार धरम संस्कृति मान पैना अधिकार बा, तर आफन मानल धरम संस्कृतिके बहुट बखान कर्ना आनक भरि कुव्याख्या कर्ना संघरेन डेख्क दङ्ग पर्ठु । आपन चल्टी आइल धरम संस्कृति भित्तरके निमजा पक्षह सुधारक छोर्क आनक धरम मजा हो कना मही निलागट । थारु संस्कृति ठिक निहो थारु धरम मानु ट खुबसे बोक्सिन लागट । आजकाल क्रिश्चियन धर्म मान्नु ओठसे बोक्सिन नैलग्ठ कना बखान कर्ना मनैन्के कन्पट्टीम चराट पर्नास मन लागठ । असिन व्याख्या कर्ना मनै जात्तिक टलकिच्रा हुइट । और डोसर मेरिक कहानी जोर्नास मन लागल । आजकाल हमार देशक लाखौ युवा विदेश गिल बाट । हमार गाउँमसे केल करिब एक दर्जन युवा विदेश कमाए गिल बाट ।  जिबलाल भर्खर भ्वाज कैल रह बोप्रा । बठिन्या जन्नी छोर्ख किही जैनास मन लागी, विदेश । तर बाध्यता, आफन घर पर्यारके आर्थिक गर्ज टर्ना ओ कुछ कमैना हिसाबसे दक्षिण कोरिया गैल रह । गैलक एक बरस नै पुगल रलहिस् कि का यहर लौली जन्नी डुसर छिमेकी गाउँक बुह्र्वासे सिलिग गिलिस् । विदेससे ठरोक पठाइल रुप्या मनरख्नकम उराइ लागल । आब का लेबी । मिलघस बहर्टी गिलिन् । सौतमुर भटरसे ठर्वा ले मर्ली । इ घटनाके प्रतिकृया डेटि धरकटान बुबा कल–“अट्रा मजा घरबार रटि रटि फे दु दुठो लर्कक् बाबासे हरबरा परल टलकिच्री ।” धरकटान बुबा कल–“अट्रा मजा घरबार रटि रटि फे दु दुठो लर्कक् बाबासे हरबरा परल टलकिच्री ।” पाठकवृन्द ! आब मै अप्नेक हुकहन आजसे ११ बरस आगेक वि.स. २०७१ साउन महिनक २८ गते अइलक बह्र्याके प्रसङ्ग जोर्नास मन लागल । उ बह्र्याले सुर्खेत, दाङ, बाँके, बर्दिया लगायत कैलालीम फेन महा जोरसे धनजनके क्षति करल । असिन विनासकारी प्राकृतिक प्रकोपले सयौके ज्यान लेहल, सयौं बेपत्ता हुइल, हजारौ विस्थापित हुइल । बाढीपिडित हुकहन स्थानीय स्तरम विभिन्न संघ संंस्था, व्यापारी हुक्र आफन नाउँ मिडियाम आनक लाग एकएक पोक्री चाउचाउ, चिउरा राहत वितरण कर्ना टलकिच्रन डेख्गिल ।   ‘स्थानीय बुद्धिजीवी मुफतलालले बाढीपीडितलाई दुई पेटी चाउचाउ प्रदान गरेका छन्’ कना मेरिक समाचारप्रेमी टलकिच्रा यहाँ ढ्यारनक बाट । तर वास्तविक समस्या हल कर्ना ओहर ध्यान निडेना प्रशासनके तालफे खेचुइहेक चालम अनि बाट भर बरे बरे कर्ना टलकिच्रा सरकार ना ट कौनो व्यवस्थापन कर्ल हो ।  हमार देशके टलकिच्रा सरकार फे ओस्ट बा ।  प्रति बाढी पिडित घरम एक लाख डेना राहत रकम महिनौ समय बिटट् घरिम सम्वन्धित पिडित व्यक्ति नइपइट । टब्ब सुर्खेतके राजनीतिक दल हुक्र पिडितके नाउँम राहत संकलित रकमके दश प्रतिशत लेहल सुन्नु ट चुट्टी पकर्ख घुमा घुमा गालम चराट चराट मर्नान मन लागल । असिन ट हमार दलके नेता बाट । असिन मौकाम चौका मर्ना इमानदारिता निम्जल दल ओ नेता रलक देशम टलकिच्रनके संख्या ढ्यार बाट । नेतनके आसेपासेन डान डान पानी केल पैठल, पिडित राहत पा सेक्ल कल । जेकर घरबास निहुइन, हुकनक अबस्था जिउके टिउ बाटिन् । असिन ट टलकिच्रा राज्यक निकाय बा । अस्टख हर क्षेत्रम एकसे एक टलकिच्रा बाट ।  काम कर्नासे नाउँ कमाए खोज्ना समाजसेवी; लेखरचना कभ्बु नैलिख्ना, आनक लेखम हाँसीमजा उरैना पाठक; स्कुलिम पह्राइक छोर्ख टिउसनके खेती कर्ना शिक्षक, बिना काम निप्टैल कमिशन खाक ठेक्दारिन रकम डेना कर्मचारी, नक्कली बिल भर्पाइ बनाख बजेट निप्टैना हाकिम; राजनितिक भागवन्दाम नातपात, कार्यकर्तन केल जागिर खुओइना नेता, नक्कली समान बेच्ख पैसा असुल्ना व्यापारी सबका सब टलकिच्रा हुइट ।   बीरेन्द्रनगर, सुर्खेत  

संगीतमा ‘एआइ’को उच्छृङ्खल प्रयोगः कला, संगीत र साहित्यको अपमान

संगीतमा ‘एआइ’को उच्छृङ्खल प्रयोगः कला, संगीत र साहित्यको अपमान

२५६ दिन अगाडि

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१ मंसिर २०८२

                                           एआइबाट बनाइएको गीतकार महेश कुचिलाको ‘मान लेनु साथी टुहार’ बोलको थारु भाषाको गीतको भिडियोको दृष्य । सञ्जय सुमन आजको प्रविधिक युगमा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ले जीवनका धेरै क्षेत्रमा क्रान्ति ल्याइरहेको छ। तर सबै क्षेत्र प्रविधिद्वारा प्रतिस्थापन हुन उपयुक्त हुँदैनन्। तीमध्ये सबैभन्दा संवेदनशील क्षेत्र हो—गीत–संगीत। कलाको आत्मा मानवीय अनुभूति, साधना, र सांस्कृतिक चेतनामा बसेको हुन्छ। यिनै कारणले धेरैको दाबी छ कि गीत–संगीतमा एआईको प्रयोग गलत हो र यसले संगीत साधक तथा संगीतकर्मीको अवमूल्यन गर्छ।  संगीत केवल धुन र तालको संयोजन मात्र होइन; त्यो हृदयको संवेदना, पीडा, आनन्द तथा व्यक्तिगत यात्राबाट जन्मिएको कला हो। एआईले लाखौँ डाटाबाट नयाँ धुन ‘जेनरेट’ गर्न सक्छ, तर अनुभूतिद्वारा जन्मिएको संगीत सिर्जना गर्न सक्दैन। मानवीय आत्मा नभएको कलालाई वास्तवमै “संगीत” भन्न मिल्छ ? यही प्रश्नले एआई संगीतको वैधतामा शंका उत्पन्न गर्छ। एक संगीतकारले स्वर, ताल, लय, र प्रस्तुतीकरणमा पुग्न वर्षौँसम्म निरन्तर साधना गर्छन्। पछिको पुस्तालाई प्रेरणा दिने यही संघर्ष हो। तर एआईले एक क्लिकमा गीत सिर्जना गर्न सक्छ। यसले कलाकारको सीप, समय, मेहनत र समर्पणको मूल्य घटाइदिन्छ, किनकि बजार उत्पादनमुखी बन्दै जाँदा “द्रुत उत्पादन” लाई प्राथमिकता दिन थाल्छ। एआईले सिक्ने आधार फेरि मानवकै सिर्जना हो। एआईद्वारा बनेका धेरै गीत–धुनमा प्लेजरिज्मको जोखिम उच्च हुन्छ। मौलिकता कमजोर हुँदै जाँदा सर्जकको पहिचान ओझेल पर्न सक्छ। संगीत कला हो, तर एआईले संगीतलाई डाटा प्रवाह बनाइदिन्छ। न मौलिकता, न सांस्कृतिक आत्मा—कला केवल मिश्रणको परिणाम बन्न पुग्छ ।  संगीतकार, गीतकार, एरेंजर, कम्पोजर, स्टुडियो टेक्निसियन, सेसन प्लेयर—यी सबै पेशा मानवीय सर्जनात्मकतामा आधारित छन्। एआईले यिनका धेरै भूमिकालाई सस्तो, छिटो र ‘परफेक्ट’ भनेर प्रतिस्थापन गर्न थालेपछि हजारौँ कलाकारको रोजगारी प्रभावित हुन्छ। संगीतको बजारमा आर्थिक असमानता बढ्दै जान्छ—प्रविधि कब्जा गर्ने थोरै कम्पनी वा व्यक्ति फाइदा लिन्छन्, तर कलाकारहरू पछाडि धकेलिन्छन्। हाम्रो संस्कृति, लोककला, र परम्परा मौखिक र प्रयोगात्मक अभ्यास मार्फत बाँचेको छ। यदि एआईले भजन, लोकगीत, तीज, सोरठी, चौथी, अरनिको शैली, गण्डकी लोकधुन जस्ता परम्परागत स्वरूपलाई ढाँचाबद्ध मात्र बनाइदियो भने मनको भावना हटेर संस्कृति डिजिटल आर्काइभको वस्तु बन्ने जोखिम हुन्छ। मानिसले बनाई राखेको संगीतलाई मेसिनले पुनःपरिभाषित गर्न थाल्नु सांस्कृतिक क्षति हो । एआईले सिर्जना गर्ने गीतको उत्तरदायित्व कसको ? यदि धुन चोरी भयो भने ? यदि गीतले गलत सन्देश दियो भने ? कलाकारसँग नैतिक दायित्व हुन्छ; एआईसँग हुँदैन। यसले संगीतलाई जिम्मेवारीविहीन उत्पादन बनाइदिन सक्छ।

थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवादः  दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति (२०१६) 

थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवादः दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति (२०१६) 

२६२ दिन अगाडि

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२६ कात्तिक २०८२

२०१६ सालमा दाङबाट प्रकाशित भएको ‘दंगीशरण बडकिमार गुरुबाबाकि जन्मौति’ पुस्तक २०८२ सालमा पुनः प्रकाशन भएको छ । हालसम्म प्राप्त थारु भाषाको यो पहिलो पुस्तक हो । यसको भूमिका थारु तथा नेपाली भाषामा रहेको छ । उल्था हुबहु नमिले पनि थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? शीर्षकमा थारू पुस्तकमा पहिलो भूमिका अनुवाद यही नै भएको लावा डग्गरको ठहर छः थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? दुःख सकिये पछि सुख आउँछ । रात सकिये पछि दिन आउँछ । तर हाम्रा पछौटे जातिहरूको उत्थान कैले होला ? र कसरी होला ? भन्ने कुरा अझै राम्रो सँग खुल्न सकेको छैन । यसमा थारूश्र जाति प्रधान छ । थारू जातिको उत्थान कसरी होला ? भन्ने प्रश्नमा हाम्रो त उत्तर यो छ कि थारू जति मात्र होइन समस्त जातिको र राष्ट्रको उत्थान, जब सम्म आफ्नु यथार्थ मौलिक इतिहास प्रकाशमा आउँदैन, तब सम्म कसैको उत्थान हुन सक्दैन ।  तसर्थ प्रत्येकको आफनु–आफनु सत्य इतिहास खोजेर प्रकाशित गरि प्रचार गर्नु पर्छ । अनिमात्र उन्नतिको बाटो पैल्याउन सकियेला । यो काम सबैको साझो हो । यौटाले मरि मेटिये पनि होइ सक्दैन । यसो हुनाले सबैले मिलेर तन मन धनले आफनु जातीय काम गर्नु पर्छ । नत्र पछौटेका पछौटे नै रहुन पर्ला । इतिहास भनेको त्रिकालदर्शी दिव्यदृष्टि हो । शिलावंशावली, खण्डहर, किला, काँडा, क्रिया, कर्मकाण्ड, कथा, किंवदन्ती, लोकप्रसिद्धि, भजन, बडकिमार, छोटकिमार, अम्मारपाटी, गुरुवावाकी जन्मौति, सुरखेल, रामजनम्, रतनपारखूकथा, दङगीशरण कथा चाल, चलन, व्यवहार, वेष, भूषा, भाषा इत्यादि इतिहासका सामग्री हुन् । इनको सङग्रह सबै ठाउँ बाट गरेर सर्वाङगीण इतिहास लेखेर प्रचार गर्नु पर्छ । इतिहासका जगमाथि सबै तिरबाट सुधार गर्दै लग्नु पर्छ । अनिमात्र थारू जातिको र अरु कुनै जातिको उत्थान हुन सक्ला । राउटया आदि कतिपय जातिको इतिहास –इतिहास प्रकाशमा प्रकाशित भै सक्यो । परन्तु थारू जातिको इतिहास प्रकाशित भयेको छैन । अरुले लेखेको इतिहास साँचो हुन सक्तैन । तसर्थ समस्त थारूजति सँग अनुरोध छ कि आफनु कल्याण गर्नु छ भने माथिका कुरामा ध्यान दिउन् ।  अज भनौँ भने कतिपय हाम्रा थारू जाति भाइहरूमा आफना दँगाली थारू राजा दङगीशरण को कथा (इतिहास) सम्म पनि थाहा हुँदैन । जब सम्म आफनो जातिको इतिहासको सिंहावलोकन गरिदैन  तब सम्म उन्नतिको मार्ग लिन सक्दैन । थारू जाति अधिवासी हुन् । प्राचीन थारू राजा थिए भन्ने कुरा राष्टका इतिहासले प्रमाण साथ बताइ रहेको छ । यस युगमा पनि हाम्रा जाति भाइमा इतिहास तर्फ विचार भएन भने कति सम्म पछौटे जाति हुनु पर्ने हो भन्न सकिदैन ।  अनुरोधक                            प्रा.मं नियमनाथ महानुभाव बदरीनाथ                        दाङ १२/१२/१२    अनुवादः थारू जातिके उत्थान कैसिक होइ ? दुःख ओराइ तब सुख हुइत् । रात गैल से तय दिन आईट् । परन्तु हमार पाछे पीछरलक् जाति हमार के उद्धार कैह्या होई ? कैसिन होई ? कहलक बाट चुम्मर से खुलल नै हो । इहुर थारू जाति बडा वा । थारू जातिके उद्धार कैसी करके बनि ? कहलक बाटमा हमार कहना इह बाकी थारूके तैसन् बतक्वोई (इतिहास–कथा) नहि देख परि तब सम्म सक्कुके कैसिक जान परि । वह अलग अलग  आफन फुरफुर पुरान लिखलक सुनलक देखलक बाट खोजके सकुनक लाग देखाय परी, बुझाय परी, समझाय परी । तब ठुन्यार डगर मिली, चुम्मर–चुम्मर कमाही मिली । इ सज्या धन्दा सकुनक हो । एकल मनइ मुगइलसे फेन नइ हो सकी । ऐसिन आफन जातउद्धार धन्दा विचार कै के आफन तन मन धन से आफन जातीय धन्दा कर परी । नहि तो पाछक पाछ रह परि । इतिहास कहलक त्रिकालदर्शी दिव्य दृृष्टि कहल बा । शिलापत्र तामापत्र मुनापात्र चाँदिपत्र मुद्रा  लालमोहोर स्याहामोहोर वंशावली खण्ढहर किला काँडा क्रिया कर्मकाण्ड कथा किंवदन्ती लोकप्रसिद्धि भजन बडकिमार छोटकिमार अम्मार माटी गुरुवावाकि जन्मौति सुरखेल रामजलम् रतनपारखू कथा दंगीशरणकथा चाल चलन व्यवहार वेष भूषा भाषा सक्कु इतिहास सामान हुइत् । यकार सक्कु जमा कैके सक्कु आपन पुरान इतिहास लेखके सक्कु बाँट परि तबमात्र थारू जाति अउर फे उद्धार होई  । राउट्या जाति अउर के इतिहास–इतिहास प्रकाशमा प्रकाशित भइल । थारू जाति के इतिहास प्रकाश नइ भइल बा । अउर मनै के लेखल इतिहास सच्चा नै हुइत् । सकु थारू जाति सङ आग्रह हमार बा आपन जात उद्धार (कल्याण) करना मन बा तो उपर लिखल बाट माहा विचार करि । दाङ के थारू राजा दङगीशरण के बतखोइ (कथा) तुलसीकृत रामायन जैसीन हमार सङ मीलल बा, उसके प्रकाशन न करके नइ हुइना बा ।  योगप्रचारिणीतः                         प्रकाशक प्रचारको संवत् २०१२                             म.भा. बदरीनाथ योगी शिवरात्रि                            प्रा.मं. नियमनाथ योगी   नोटः पुस्तकको भूमिका थारूबाट नेपालीमा अनुवाद कार्य भएको थियो । भूमिकामा उल्लेख भए अनुसार पुस्तक छाप्न २०१२ सालमै तयारी थियो । अनुवाद हुवहु भने मिल्दैन । यसको भाषा डंगौरा भन्दा अवधी मिश्रित छ । त्यसैले यो अनुवाद कुनै थारू स्रष्टाबाट नगराई योगीद्वय स्वयमले गरेको बुझिन्छ । 

डफ रे डफ, मै टुहि जानुँ 

डफ रे डफ, मै टुहि जानुँ 

२६३ दिन अगाडि

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२४ कात्तिक २०८२

–श्याम बहादुर थारु   १.ओरुवा टरौनि पस्चिमा थारुनके मेरमेरिक लोकगिट मसे ‘डफेक गिट’ एक हो । कुवाँर कार्टिक महिना ओरसे सुरु होके फागुन, चैट सम डफेक गिट गा जाइठ । डफ ओ मन्ड्रा बजैटि गैना हुइलक ओरसे यि गिटके नामाकरन डफेक गिट हुइल हो । डफ ओ मन्ड्रक् मन लोभ लग्टिक बोलसे सुटल मनैन् उठाडेहठ ।  डफेक गिट फेन मेरमेरिक बा, जेमनासे लाल्ला, ढमार, चाँचर, होरि किहिन प्रमुख रुपमा लेजाइठ । महिना अनुसार यि गिटके भाखा, बाजाके टार (टाल) मा फेन परिवर्टन हुीयट जाइठ । कुँवार कार्टिक ओर लाल्ला सुहावन लागठ कलेसे अगहन ओर ढमार सोहाइठ । ढमार गाके ओराइट वेला चाँचर गाजाइठ । होरि (होलि) टेउहारेम होरि डफ गिट गा जाइठ । मनो एक पाछे डोसर गिट गाइक परना कनो जरुरि नाइ रहठ, का करे कि डुइ मेरिक गिट अक्कै डिन गाइ सेक्जाइठ ।  टरटिउहार मनाइवेर हो या खेटिपाटिक काम करेवेर डफेक गिट गैना चलन बा । मकै टुुरके सेकके डिहुवा जोटेवेर, ढान काटेवेर, डौरि डाँइवेर, खेरन्वा बसेवेर हो वा होरि, अगहन जैसिन चाडपर्वमे यि गिट गाजाइठ । विसेस कैके अगहनमा डुल्हि लेहे गैल वेला डुल्हा पच्छ ओ डुल्हि पच्छ विच डफेक गिटके माढ्यामसे घमासन जुजिक जुझ्झा चले कहना पुर्खनके कहाइ बा । डफेक गिट सुरु कर्ना बरा सजिल रहठ, काजे कि एकठो मन्ड्रा ओ डफ हुइलेसे हो जाइठ । प्राय वैठके गैना यि गिट डुुइु समुहमा विभाजन हुके, एक पच्छक उठाइल गिट डोसर पच्छ लेठै । अस्टेके डुइ पच्छ बिच गिट उठैना पालिक पाला चलठ । पाला साटेवेर, ढरान बडलेबेर बिचमे चट्निक् रुपमा ‘पहपट’ गैना चलन बा । पहपट गाइवेर गिट गउइयन् नच्ना, कुड्ना कैके जोस्साके डफ नचैठंै, जिहिनसे गिट गउइयन उर्जा ठप्ना काम हुइठ । पुरुस ओ महिला सवजे गैना हुइलेसे फे, ज्याडा भाग डफेक गिट पुरुस हुक्रे गैना प्रचलन बा । यि गिटमे ढेरजैसिन नारिनके वेडना, नारिनके अवाज ओ पुरान ढार्मिक घटना किहिन गिटके रुपमा प्रस्टुट कैल बा । गिटके सुरुवाटमा गैना टुक्का किहिन ‘टेक’ कहजाइठ । यकर पाछे उठैना टुक्का किहिन ‘उलार’ या ‘अँखरा’ कहजाइठ । प्रट्येक अँखरा पाछे टेक किहिन डोहर्‍या जाइठ । जस्टेः          टेकः    फुला फुलिगै अनेक, अमरिट फुलुवा अनार सोहै हो । २     उलारः कौने फुला फुलै लाल गुलाब, कौने फुलै छेटनार ।     कौने फुला मोर डेवाइ वास सुवास, अमरिट फुलुवा अनार सोहै हो ।।     फुला फुलिगै अनेक...     मखमल फुला फुलै लाल गुलाब, गेंडा फुलै छेटनार ।     डौना ओ बेबरि डेवाइ वास सुवास, अमरिट फुलुवा अनार सोहै हो ।।       फुला फुलिगै अनेक... प्राय प्रस्न उट्टर सैलिमा रहल यि गिटमा अपनहि प्रस्न करके अपनहि उट्टर डेजाइठ । पहिलेक अँखरामा प्रस्न करल रहठ कलेसे डोसर अँखरामा उट्टर डेहल रहठ । जस्टेः टेकः    खुंझरु खुंझरु नुइया बोलै रे डैया, अव कैसे निकरुँ अँगनवा हो ।२ उलारः के टोरे काह्रल सुटहि ओ गोँयजि, के टोरे बिनल पनटोपनि । के टोरे बिनै मौनि डेलरिया, कौने चलै ससुरारे हो ।। खुंझरु खुंझरु नुइया... मैया मोरे काँह्रै सुटहि ओ गोँयजि, भउजि मोरे बिनै पनटोपनि । काकि मोरे बिनै मौनि डेलिया रे, ढियरि चलै ससुरारे हो ।। खुंझरु खुंझरु नुइया... २.डफेक गिटके प्रकार  छोटसे बरटक थारु–मेहरारुनके बरा पुरानसे गीयट अइलेक यि गिटमा समाजके मेरमेरिक विसयवस्टु समेटल रहठ । सामाजिक परिवेस, प्राकृटिक सुन्डरटा, ऐटिहासिक घटना, ढार्मिक घटना जैसिन विसयवस्टु किहिन गिटके माढ्यमसे प्रस्टुट हुीयट आइल बा । डफेक गिट समय (महिना) अनुसार बडलटि जाइठ, जेमना गिटके ढुन लय फरक फरक रठिस । ओस्टेके कोनो गिटमे विरहाक् वारेम चर्चा कैगिल बा कलेसे कोनोमा हाँसि मजाक समेट रहठ । यकर आढारमा डफेक गिटके प्रकार प्रमुख रुपमा निम्नानुसार बा । २.१ लल्ला गिट डफेक गिटके सुरुवाटमा गैना गिट जो लल्ला हो । लम्मा राग रहल टेज बोलिसे लल्ला गा जाइठ । कुँवार कार्टिक महिना ओरसे सुरु कैना यि गिटके प्रटयेक अँखरामा लल्ला सब्ड आइलेक ओरसे यकर नाउँ लल्ला परल कहना विस्वास बा । २.१.१ सुमरौटि थारु जाटि हरेक सुभ कार्य सुरु करेवेर अपन डेउटन सुमेरके छाकि बुँडा डेहना चलन चल्टि अइलक ओरसे डफेक गिट सुरु करे वेर फेन यि कार्य कैजाइठ । लल्ला गिटके भिट्टर फेन मेरमेरिक गिट बा, जेमनासे सुमरौटि पहिला गिट हो । टेकः    ढुमरु ढुमरु बोलै मंडरा रे डैया, नाच्यो सडासिव हरे डगरा ।२ उलारः उठो हरि लल्ला रे, पहिले मै सुमिरहँु सरसटि आपन हो, टव सुमिरौं कलिमारि डैया । काँस ढाक रस डेहो, हृडय लागो हमार, कन्ठे वैठो हमार, टव रह्यो डाहिन ।। ढुमरु ढुमरु बोलै.... उठो हरि लल्ला रे, डोसरे मै सुमिरहँु भुइया भुँइहारिन हो, टव सुमिरौं जगनाठी डैया । डहिने रह्यो डेवाल । ढुमरु ढुमरु बोलै... २.१.२ फुलवार लल्ला गिटमसे फुलवार फेन एक हो, जेकर अंस टरे प्रस्टुट कैगिल बा । टेकः    बारु फुला पिया रोपि गए रे डैया, बारु फुला पिया रोपि गए ।२ उलारः उठो हरि लल्ला रे, अरे सिरहेटो ढरै मालिन सुढरन डेलवा हो ।     अरे जाइ पुग्नै फुलवारे डैया, बारु फुला पिया रोपि गए हो ।     बारु फुला...     उठो हरि लल्ला रे, फुलरिया घुमि घुमि हेरै मोर मालिन हो । कोइ पापि डेहनै सरापि डैया, फुलरिया मोर उकठि गैनै हो । बारु फूला पिया......     २.२ ढमार गिट ढमार गिट, डफेक गिटके सबसे महटवपुर्न गिट हो । ढमार गिट भिट्टर फेन फरक फरक नामके गिट बा, जेकर बारेम संछिप्ट जानकारि टरे कैगिल बा ।  २.२.१ साढारन ढमार सामाजिक रहनसहन, मैया प्रेम, संयोग वियोग जैसिन गिट सामान्य ढमार अन्टरगट परठ । जस्टे कि अपन गोस्यासे डुर हुइल वेला गैना विछोरके गिटः टेकः    पिया विछुरै रे, पिया बिलमै परडेस हमार । अभिरंग होलि मै कैसे खेलम ।। उलारः जौं मइ जनटुँ रे पिया चलिजैहि, खोजटु मै डेस वंगाले । पिअवाके साठे सटिन होइजंैटुँ, पुरबि जलम फेर पैटुँ ।। पिया विछुरै रे... ओस्टेके, डोसर उडाहरन  टेकः     मै बवारि मोर टन बवारि, डेखो आज पिया बिना मै बवारि ।२ उलारः उरटा गुलाब लाल भैनै बाडर, सरजे मुलुक ओजियार । भुँख पियास निंड नाहि आवइ, अग्नि जलावट टन बवारि ।। डेखो आज पिया विना... जौने डिन अइनै साटो पंच रे, जौने डिन अइनै ठकाइ । जौने डिन पिया मोर गैनै विडेस, साँचिन लैगइ उठाइ ।। डेखो आज पिया विना... २.३ बिहग्रा हुरडुंगुवा गिटमा अटि लोकप्रिया रहल बिहग्रा गिट ढमारमा फेन ओटनै मिठास ओ चट्कार मानजाइठ, जेकर छोट अंस टरे प्रस्टुट कैगिल बा । टेकः    खेलि लेबुँ डिन चारे नैहरुवा मै खेलि लेबुँ डिन चारे ।२ उलारः पिहले गवना आवइ टिन जाने हो, नौवा ब्राह्मन ठाकुर । पैया मैं लाग्यौं गाउँके ठकुरुवाक, अवकि लगन डेहो टारे ।। खेलि लेबुँ डिन चारे... डोसरे गवना आवइ ससुरा हमारे अव जाइ कहावइ लजाउ । पैया मैं लाग्यौं अपने ससुरुवक, अवकि लगन डेहो टारे ।। खेलि लेबुँ डिन चारे... २.४ बठुवाक जोर्नि डफेक गिटमा सिपार बठुवा नामके मनैयाक जोरल गिट किहिन बठुवाक जोर्नि कहजाइठ ।  टेकः    बाठे है नाउ जाडि, डेसवा रहव छाँइ ।२ उलारः अरिया विटोरे बरिया विटोरे, और बिटोरे ब्राहमन  । बैठि ब्राह्मन बेड विचारे, लगन डेहो वटाइ, डेसवा रहव छाँइ ।। बाठे है नाउ .... २.५ कन्हैयाक झगरा कान्हाके लिलामे आढारिट ढमार गिट ‘कन्हैयक झगरा’ नाउँसे परिचिट बा । टेकः    लाज लेहो बिर्जा हमसे टु कान्हा ।२ उलारः साट सखिया मिलि गिलमट करैं, चलो जाइ सगरा लहाइ । चिर छोरि राढा ढिक ढरि डेवइ, जमुनामा करे असनाने ।। लाज लेहो बिर्जा... केहुरिसे आवइ बारु कन्हैया, लुकटि छिपटि चलि आवइ । सवहे चिर लैगै उठाइ, ढारे कडम कइ पेंर ।। लाज लेहो बिर्जा..... २.६ राम बनवास राम अपन राजकाज छोरके बनवास जाइवेरिक प्रसंगमा गाइल ढमार गिट राम वनबास हो, जेकर अंस टरे प्रस्टुट कैगिल बा ।  टेकः    उनका डिल कोइ डेउ समुझाइ, वनका चलै डुनु भाइ हो ।२ उलारः रठहे साज प्रभु वनका सुढावाँइ, डुख भइनै माटा पिटाकै रे । जबसे रठ नयन ओटि भैनै, किहिका पठैबुँ हाल ललना ।। उनका डिल कोइ ... २.७ सिटा हरन हिन्डु ढर्म ग्रन्ठ रमायनमा जव रावन सिटा माटा किहिन हारके लैजाइ वेर ओ लंका युद्ध के विसय वस्टु समेटल गिट सिटा हरन हो । जस्टेः टेकः    सैया वन छोरि चलो निरमोहि ।२ उलारः एक टोरे सिटा अंगकै पाटिर, डोसरे गरभकै भारि हो । ढिरेसे चलो लछमन डेउरा, हमहु चलव सँग साठ हो । टेकः    रानि सिटा रानि सिटा जो होटि पन्ठुलाल, कव मिलै रघुविरानन्ड से ।२ उलारः कहैं मन्डोडरि सुनो राजा रावन, सिटा डारो पठाइ । रावन मारि सिटा अगवाइहैं, अव ना बचावै रे कोइ । २.८ सुडामा–कृस्ना मित्रटा सुडामा ओ भगवान सिरिकृस्न बिचके घनिष्ट सम्वन्ढके बारेम गैना ढमार के अंस टरे उल्लेख कैगिल बा । जस्टेः टेकः    सुडामा मन्डिल डेखि डरावैं ।२ उलारःएक रहै राम मरैया, कंचन खम्बा गरे ।     एक रहै मोरे टुल्सि विरुवा, जेंहिटर भोग जले ।।     गज भर कपरा सुडामा कवो ना पहिरे, हाँठि न झुल परे ।     बुन्डभर टेल सुडामा कवो ना बारे, लाखन डिप जले ।। ३. चाँचर गिट डफेक गिट मढ्ये चाँचर गिट फेन एक हो । चाँचर गिट प्राय ढमार गाके सेकल समयमा गैना गिट हो । लम्मा साँस (स्वर) टानके गाइक पर्ना हुइलक ओरसे और गिटके टुलनामा कर्रा मानजाइठ । चाँचर गिटके एक टुक्का प्रस्टुट कैगिल बा । टेकः    मैया रे खटपटे रे नयन मटवाला रे, सैंया निरमैया खटपटे ।२ उलारः अगिया लागल डुर डेस चाँचरे चाँचरे, जरिजावै डौना मेरौना । ओजरिया बाबा डोलिया फँडायो, डुरु डेस हे ससुरारे ।। डस सखि आगे डस सखि पाछे, वैठे कडारे । कडम जुर छंहिया, सैया निरमैया ।। ४. होरिक गिट होरिक गिट ढमार अन्टर्गटे परठ, टर होरिक गिट किहिन विसेस कैके होलि पर्वमा गैना हुइलक ओरसे यि गिटके छुट्टे महट्वा बा । घर घर होेरि खेल्टि मलार स्वरसे गैना यि गिट वरा सुहावन लागठ । जस्टेः     टेकः    होरि मघहि गइ लागै बहुट डिन ।२     उलारः के टोरे पालै रे सुगना परेउना, के टोरे पालै रे ।     के टोरे पालै गलहार मैना, होरि मघहि गइ लागै बहुट डिन ।।     सासु मोरे पालै रे सुगना परेउना, सासु मोरे पालै रे ।    डेवर मोरे पालै गलहार मैना, होरि मघहि गइ लागै बहुट डिन ।। ५. पहपट डफेक गिटके बिच बिचमा टुक्काके रुपमा गैना पहपट गिट बहुट चटकार मान जाइठ । उहेमारे पहपट किहिन डफेक चट्नि, सोंग के रुपमा लैजाइठ । डफ उलर उलर, छटक छटक नच्टि गैना यि गिट पाला साँटेवेर ओ ढरान बडलेवेर गा जाइठ । मंडरा ओ गिटके ढुन पुरै फरक हुइल पहपट गायक ओ स्रोटा हुकन पुनर्टाजगि कैनामे सहयोग करठ । जस्टेः टेकः    सेम सुनडरिया रानि, सेम पियारिया रानि ।२ उलारः केकर बकुलिया उबरि कुबरि, केकर बकुलियक टुटल टाँग । केकर बकुलिया सेम पियारिया, पिटरि मेँराइल ठोँर रे ।         सेम सुनडरिया... सासुक बकुलिया उबरि कुबरि, सैंयक बकुलियक टुटल टाँग । डेउरक बकुलिया सेम पियारिया, पिटरि मेँराइल ठोँर रे ।         सेम सुनडरिया... ६. ओरौनि थारु लोक गिटमसे डफेक गिट लोकप्रिय विढा हो । सडियौैसे लोक अभ्यासमा रलक डफेक गिट जाटिय ओ साँस्कृटिक पहिचानके आढार हो । यि गिटमा समाजके सुख–डुख, मैया–प्रेम, संयोग–वियोग, ऐटिहासिक घटना, ढार्मिक प्रसंग साठे जिवनके भोगाइ समेटल रहठ । आजकालके पिंढिमा लोकगिट प्रटिके रुचि हेरैटि जाइटा । थारुनके गहनारुपि परम्परागट लोक नाच–गिट किहिन लवा आढुनिक नाच–गिट प्रटिस्ठापन करटि जाइटा । उचिट वाटावरनके अभावमा पुरान पुस्टा फेन ढिरे ढिरे विस्रैटि जाइटा । पुरान गिट–बाँस मुखग्रे गैना हुइलक ओरसे यि गिटके लिखट बहुट कम बा । यि कारनसे लोपोन्मुख अवस्ठामा पुगल डफ गिटके संरच्छन सम्बर्ढन हुइना जरुरि बा । ठाकुरबाबा न.पा. ५, शाहीपुर, बर्दिया  लेखक शिक्षण पेशामे आवद्ध बटाँ । साभारः बिहान