२०५९ सालमे मुक्तिक खोज उपन्यासमार्फत् थारू साहित्यके फँटुवामे पैला ढारल छविलाल कोपिला संयुक्त संग्रह लगाके दर्जनसे ढेर पोस्टा निकार सेक्ले बटाँ । उपन्यासबाहेक उहाँक आकुर पोस्टा खासकैके कविता बिधामे केन्द्रित बटिन् । उहाँ साहित्यकार व्यक्तित्वके अलावा पत्रकार व्यक्तित्वसे फेन परिचित बटाँ । आजकल लावा डग्गर त्रैमासिकमार्फत् साहित्यिक पत्रकारितामे उहाँक् पैला आगे बह्रल बटिन् । इहे सिलसिलामे उहाँक् ‘हमार संस्कृति’ नामक् खोजमूलक लेख संग्रह २०७१ वैशाखमे प्रकाशन हुइल बा ।
पत्रकारितामे लेख लिख्ना सिलसिलामे समसामयिक बिसयमे कलम चलैना एकठो बाट, मने पत्रकार मनै आपन लेखके छुट्टे संग्रह जो निकारेबेर सन्दर्भ स्रोतमे बहुट ध्यान पुगाइ परठ । यम्ने सन्दर्भ सामग्रीके उल्लेख हुइल बा । ओहेसे इ पोस्टा थारू सांस्कृतिक लेखके लग महत्वपूर्ण दस्तावेज ओ संग्रह करे लाइक बनल बा । इ पोस्टामे १९ ठो सांस्कृतिक लेख संग्रहित बा । थारू जातिनके लोकगीत, संस्कृति ओ गीतिसाहित्य सिर्सकके पहिला लेखमे ढेर बाट अँट्वइना प्रयास कइगैल बा । थारू समुदायमे लोकगीत कहटि कि गीतिसाहित्य ओस्टे आ जाइठ । उप्परसे संस्कृति बिसय जोरटि कि यकर फैलावट ओस्टे बह्र जाइठ । ओहेसे इ लेख कुछ छ्र्यासमिस लागठ । मने थारू समुदायमे गा जैना टिउहारगीत, ऋतुगीतलगायत मेरमेरीक गीत, नाचके बारेम कुछ आख्यान सहितके वर्णन लेखहे खोजमूलक बनैले बा ।
जहाँ सजना गैलेसे पानी बर्सठ्, सिर्सकके डोसर लेखमे गोरु बेह्रना चलनके बारेम उल्लेख बा । गोरु बेह्रना चलनहे कहुँ कहुँ गैया बेह्रना फेन कैह जाइठ । इ चलन कहियासे ओ कसिक चलल् ? यकर उत्तर खोज्ना प्रयास कैगैल बा । इ लेखके कमजोर पक्ष गोरु बेह्रेबेर गा जैना सजनाके सप्रसंग व्याख्या नइ हो । सजनामे जन्निन्के जौन बिरह बेदना रठिन, ओकर व्याख्या छुट्टे पोस्टा जो बन सेकठ ।
महाभारतके प्रारुप बर्का नाच टिसर लेखमे खास कइके डस्या ओ डेवारीम नाचजैना महाभारतके कथावस्तुसे जोरगैल बर्का नाचके बारेम बा । इ नाच आब केवल दाङदेखउर, घोराही उपमहानगरपालिका, जलौरा गाउँमे किल नाचजाइठ कना लेखकके कहाइ बटिन । मै सुनल अनुसार बर्दियाके उल्टनपुरमे फेन बर्का नाच कैना चलन रहे । बर्का नाचके बारेम कुर्ट मेयर ओ पामेला डुयल अंग्रेजी संस्करण महाभारतः द थारु बर्का नाच (२०५५) मे पोस्टा निकारके अन्तर्राष्ट्रियकरण कर्ले बटाँ । असिन आउर ढेर थारू लोकगीत, नाचके बारेम अन्तर्राष्ट्रियकरण करे पर्ना जरुरि बा ।
थारू समुदायमे भोज—वियाह ओ थारू समुदायमे भोंर—पैठ्ना चलन, इ छुट्टाछुट्टे लेखमे मेरमेरिक भोज कैना चलनबारे वर्नन बा । पहिला लेखमे ठोकौनिसे, विदाइ समके बाट ओ माँगरके चर्चा ढेर बा । डोसर लेखमे भोंर पेलल् बाबासे हुइल लर्कापर्का, भोंरपैठा स्वयम् अंशके दावेदार हुइ नइ पैना कानुनी समस्याके जटिललताके बारेम लेखक अंग्रेयइले बटाँ ।
छैठौसे बाह्रौ लेख थारू समुदायमे मनाजैना टरटिउहारके बारेम केन्द्रित बा । जेम्ने गुर्ही, अष्टिम्कि, अँट्वारि, डस्या डेवारि, माघ ओ ढुर्हेरि मनैना चलनके बारेम खोज कैगैल बा । यम्ने थारू जलम संस्कार ओ मृत्यु संस्कार बारेम फेन छुट्टाछुट्टे चर्चा बा । टरटिउहार असिक मनैठाँ, ओसिक मनैठाँ कना छिछलि चर्चासे लेख कुछ उप्पर उठ्लेसे फेन थारू समुदायमे मनाजैना टरटिउहार आब् कसिक रंग बड्लटा ? उ बड्लाउ का अर्थ राखठ ? इ बारेम चिन्तन मनन कम बा । जस्टे कि माघ टिउहारके चर्चा । माघ डेवानिके भुरा खेलमे गाउँक् अगुवा बरघर चुनजैना प्रसंग टे यहाँ बा, मने थारू गाउँक् अगुवाइ आब गैरथारून्के हाँठेम् जाइटा । इ सवालमे बहस कर्ना कि नै कर्ना ? मुक्त होके कमैयन् गाउँक् अगुवाइ अपनेहे कैके सभासदसम बन्टि बटाँ । मने आम थारू अगुवन् बरघरमे किल सीमित बटाँ, ओइन चुनावमे गोटि किल बनाजाइटा । माघ डेवानिके अवसरमे आपन मुद्धा, आपन नेतृत्व इ सवालमे बहस कर्ना कि नै कर्ना ? ओस्टक जरुरी बा– अष्टिम्कि, अँट्वारि, डस्या डेवारि, माघ ओ ढुर्हेरिम बनाजैना परिकारके व्यावसायिकताके चर्चा फेन ।
लेखकके चिन्तन बटिन कि थारू समुदायमे विकृति बन्टि जाइटा जाँर डारु । इहे हो थारून् कमैया, कमलहरी बनुइया । महि लागठ, कुछ प्रतिशत यकर फेन हाँठ हुइ सेकठ, मने वास्ताविकता का हो कलेसे राज्यके नीति जो थारून् गरिब बनाइल, ओइनके मोहियानि हक सुरक्षित नै करल । ओइन मतवालीमे गरना करल । धर्म, थारू समाज ओ वास्तविकता इ लेखमे थारू जाति किल नाहि, अन्य समुदायके मनै फेन पुरान, रुढिवादी ओ अन्धविश्वासमे अन्धभक्त होके दुःख पैलक बाट उठागैल बा । थारून्के धर्म का ? यकर बारेम कौनो चर्चा नइ हो ।
थारू भासा ओे पत्रकारिताके अवस्था लेखमे लेखकके ठहर बटिन कि थारू भाषक् पत्रिका संख्यात्मक हिसाबसे ढेर प्रकाशन हुइल बिल्गैलेसे फेन गुणस्तर ओ निरन्तरताके हिसाबसे बहुट नाजुक अवस्था बिलगाइठ, इ सोह्रे आना सहि हो । मने हालसम कठेक थारू पत्रिका निक्रल, उ खुलाइल नइ हो । गुणस्तर ओ निरन्तरता कसिक कायम कर्ना यकर कौनो उपाय नइ सुझाइल हो । हमार कला, साहित्य ओ संस्कृति लेखमे बर्गीय साहित्यके चिन्तन बा । हाल आधुनिकताके नाउँमे संस्कृति परिवर्तनमे डेख्गैलक विकृतिक् बारेम टिस्लार प्रहार बा । थारू पहिचानके धरोहर जंगलकुट्टी ऐतिहासिक पर्यटकीय क्षेत्रके परिचयात्मक जानकारि डेहल इ पोस्टाके पुछ्यावन लेख हो । मोर जानकारि अनुसार इ लेख कार्यपत्र हुइल ओरसे आउर लेखसे गरु बा ।
यम्ने संकलित लेख पहिले कहाँ कहाँ छपल रहे ? ओकर सुचि फेन डेहल रहट टे उचित हुइना रहे । कौनो कौनो लेखमे फोटु नइ हो । मने ढेरहस लेखके बिच बिचमे डेगैल फोटु पोस्टाहे आउर वजनदार बनैले बा, यद्यपि छपाइमे फोटु ढुमिल बा । फोटु मौलिक हो या औरे जन्हक साभार ? इ फेन अनिवार्य खुलाइक चाहि । काजेकि आब मनै अपन फोटुक कपिराइट खोजे लागल बटाँ । हमार संस्कृति इ पोस्टा मातृभासा थारूमे जो अनुसन्धानमूलक कृतिके लावा परम्परा बैठाइल ओर्से लेखक धन्यवादके पात्र बटाँ ।
अन्तमे, छविलाल कोपिला अनुसन्धानकर्मीके परिचय इ पोस्टामार्फत् उजागर कर्ले बटाँ । महि अस्रा बा, पत्रकारिता ओ साहित्यकारके पगरिसंगे अनुसन्धानकर्मीके पगरिहे उहाँ अइना डिनमे फेन निरन्तरता डिहिं । थारू समुदायके ढेर बखारि उहाँक् मनेम भरल बटिन । उ बखारिमे घुन लगैनासे आम पाठकमे बँटहि ओ खोजमूलक लेखनमे निरन्तर लग्हि, बहुट बहुट सुभकामना । ओ इ पोस्टाहे प्रकासनमे सहयोग करल आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान धन्यवादके पात्र बा ।
(पोस्टाके भूमिकासे, कुछ संसोढिट)
प्रकाशित:
२४५ दिन अगाडि
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१३ मंसिर २०८२
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१३ साउन २०८३
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११ साउन २०८३
६ दिन अगाडि
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९ साउन २०८३
१० दिन अगाडि
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५ साउन २०८३
१२ दिन अगाडि
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३ साउन २०८३
१३ दिन अगाडि
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२ साउन २०८३
१४ दिन अगाडि
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१ साउन २०८३
१३८९ दिन अगाडि
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२५ असोज २०७९
१४२३ दिन अगाडि
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२१ भदौ २०७९
१४३३ दिन अगाडि
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१२ भदौ २०७९
१३८८ दिन अगाडि
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२६ असोज २०७९
१३३७ दिन अगाडि
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१५ मंसिर २०७९
१३९३ दिन अगाडि
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२० असोज २०७९
१३२६ दिन अगाडि
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२७ मंसिर २०७९