जिन्गिक हरेक मोरमे
टुँ महि सडा
कुछ सिखैटि गैलो
मै सिख्टि गैलुँ
मोर अंग्रि पकरके
महि टाटे टाटे कैके
पाइला सारक सिखैलो
मै सर्टि गैलुँ
जब महि निंड नैआए टे
टुँ खिस्सा ओ काठा
सुनाके निड्वाओ
महि टोहार खिस्सा ओ काठा
सुन्टि बर्हटि गैलुँ
©
बाबा टुँ मोर गल्टिक
कबो पर्वाह नैकैके
सच्यइटि गैलो
ओ हमेसा मोर सुख डुःखमे
साठ डेलो
मोर सपना पुरा करक लग
डिनराट नै समझके
भुखे प्यासे कामेम डँट्टि रलो
मोर सक्कु इच्छा ओ चाहना
बुझके महि जहिया फेन
हौस्यइटि रलो
मोर इच्छटप्रटि टोहार यि हौसला
मैया ओ श्रेयले
मै आघे बरहे सेक्ले बटुँ बाबा
सेक्ले बटुँ डुइ चार
अक्षर कुछ लिखे
महि अभिन फेन याड बा
टोहार सिखाइल ककहरासे
जिन्गिमे पहिलो चो
आपन नाउँ लेखक सिख्ले रहँु
ओ सेक्ले बटुँ यि जिन्गि जिए
सायड
आझ टु नैरटो टे
यि मोर डुन्याँ
मै कल्पना फेन करे नैसेकम
बिल्कुल कैयाँ कुचिल
अन्ढकारमे बिटट
ओ बरा मुस्किलले
बिटट यि डिन, महिना ओ साल
उहेमारे बाबा मै टुहिन
कैसिक संग्या डिउँ
टुँ परिवारके हो छट्रछायाँ
टुँ जाट्टिसे डोसर डाइ
गर्व बा टोहार छाइ हुके
टब्बे टे बाबा फुरे मै सडा रिनि रबुँ
टोहार प्रटि ।
लमही नपा–४, छुटकी घुम्ना,
देउखर दाङ, हालः काठमाडौं
साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक (साहित्यकार कृष्णराज सर्वहारी विशेषांक)
वर्ष–८, अंक–१, पूर्णाङ्क–२९, २०७३ (माघ, फागुन ओ चैत)
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