चाहे कुछो भि हौक
हर हाल मे जिन्दा रह
मरै से पैहने नै मर
जियै से पैहने नै मर
खूद के खूद से नै हर
आत्मसम्मान माइर के
जीते जी तुँ नै जर ।
नै कोनो नशा के कुलत
नै निराशा के लेल मोहलत
नै ककरो से उम्मीद कर
नै खूद से उम्मीद छोड
तुँ जिन्दा रह, तुँ जिन्दा रह,
हर हाल मे जिन्दा रह ।।
आपन क्षत विक्षत हृदय मे
खूद से मलहम लगा
आपन भग्न चित्तविथि से
करिया अन्हैरिया रंग के हटा
तुँ बोधिचित्त के बिया चिही
खूद के दिव्य प्रकाश से भर ।
दिशा आ दशा के पहिचान कर
तुफान त कहियो ओराइबे करतै
हर हाल मे नाह के खेवैत रह
हर हाल मे तुँ जिन्दा रह
खूद अपने आप के साथ
आपने देह के हर साँस के साथ
तुँ जिन्दा रह, तुँ जिन्दा रह,
हर हाल मे जिन्दा रह ।।
तुँ जिन्दा रह,
हर हाल मे पढ लिख
कुछ नयाँ सोंच, कुछ कर नयाँ
नयाँ सिल्प नयाँ ज्ञान
देख कुछ नयाँ सपना
कर तद अनुरुप साधना
सिरजन कर कुछ नयाँ
विसर्जन कर मोह माया
कुछ नयाँ जाँच कुछ नयाँ परख
हर हाल मे चलैत चल
अपमान सहैल परतै त सह,
छति सह आ हर दुख कष्ठ सह
किन्तु फेनो खोज नयाँ डगर,
नयाँ जगह मे खरही गाड
खडा कर फेनो नयाँ गहबर
लेकिन तुँ जिन्दा रह,
हर हाल मे जिन्दा रह ।।
तुँ जिन्दा रह,
जिन्दा रह बाहर, जिन्दा रह भितर
अइ दुनियाँ के रंग विरंग से
आपन मन पसन्द के रंग चुइन के
विन्दास से खूद के भर
शान्ति से भर अपना के
उम्मिद से भर आपन सपना के
खुश रह, जिन्दा रह
करुणा से भर, मूदिता से भर
मैत्री से भर, उपेक्षा से भर
समानुभूति से भर, सत्यनिष्ठा से भर
भर हर झोली साँस से,
सुख छै ओकर संजीवन
जिन्दा रह, रह कुशल मंगल
जिन्दा रह, बहाइत रह निरन्तर
अमृतधारा प्रेम अकिञ्चन ।।
(निट्ठाह)
सप्तकोशी नपा–१, फत्तेपुर, सप्तरी
हालः साज, बाहिया, ब्राजिल
२२ अगस्त २०२५
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