-नन्दलाल चौधरी
जारमे घोङहीके सबाद बेजोर,
जब तिसीमें मिले मारके झोर
जारमे घोङही मारलने ज्या
पाइन देहके थर थर कप्या
माइरके लाबे त माजलने ज्या
माजैले गांइर काटलने ज्या
सैब कामके जब लागे ओर
जारमे घोङहीके सबाद बेजोर ।
घोङही मझहोलबा सबाद निमन
जैहनं तोरी ख्याल पेरबाके तिमन
माघके बुआरी आ रौहके शीरा
घोङही उठाबे यै सबसे लरैके बिरा
बासमती भातमे चले यकरो जोर
जार्हमें घोङहीके सबाद बेजोर ।
चीज केहेन इ घोसारलने ज्या
माजैत, झांकैत,परसैत,खरबर्या
येहेन जे चुइभतो झांपलने ज्या
फेकतौखना कानमें झरक सम्या
तन जैहनं कारी मन तैहनं गोर
जार्हमें घोङ्हीके सबाद बेजोर ।
लसुनके पत्ता,हरियरका धनियां
करूके तेल टरकाबे जब कनियां
चनी आ गरम मसोला द्या मनसे
आलस भुइजके मिलाबे जतनसे
गम गम गमके चारू ओर
बेसिये सब चुभहे कोइने थोर ।
थारू संस्कृतिके केहेन परिकार
पहचानके यकर आपने संस्कार
सभ्यतामें सोहो आपन छै शान
विरासतमें मिलल अलगे सम्मान
जरूर येतै एक दिन उ भोर
जारमे घोङहीके सबाद बेजोर,
जब तिसीमें मिले मारके झोर ।
धन्यवाद
बसघराके ८९ औं श्रृंखला (२०८२ पुस ५) मे प्रस्तुत
प्रकाशित:
२६८ दिन अगाडि
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६ पुष २०८२
१८ घण्टा अगाडि
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