कृष्ण समर्पण
डुइ जे गोचालिन रहिट
बैर टुर बन्वा पैस्ल
न्यांगट न्यांगट अँट्या गैल
सिहरा मार एकघरि बैस्ल ।
मनम अस्रा, पैना कर्रा
बैरिक जालेम फँस्ल
उ उ डुर कटि कटि
ख्वाज बैर फाँर कस्ल
खोल्ह्वा–पख्वा नंघटि गैल
काँटा डगर छेक्लिन्
कुछ डुर ट जरुर हुइ,
कना अस्राले मन सेक्ल
घाम चर्कल, पस्ना चुहल
मने यात्रा नै रुकल
लोभौरी बैर लोभ्वइटि रहल
मने पाकल बैर नै मिलल् ।
मने पाकल बैर नै मिलल् ।।
बर्दिया, हालः कीर्तिपुर, काठमाडौं
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२७१ दिन अगाडि
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३ पुष २०८२
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