–सत्यनारायण दहित
१. कलजुगके बजारमे लाज सरम बिक्टि बा
बिना मोल गरिब–गुर्वन्के करम बिक्टि बा
कब बुझ्हिँ मनै सब्के भगवान् एकठो बटैं,
यहाँ टे भगवान्के नाउँमे ढरम बिक्टि बा ।
२.पनभर्निन्हे लडियक घट्वम्से बलाइ परल
अखोरियन्हे झोपरि अट्वम्से बलाइ परल
हेरि टे, सबजे अपन पहिचानके लग लरटैं
हलि करि हरोइहेन्हे खेटवम्से बलाइ परल ।
३. कोइ चोखा हुइक लग छिट्टि बा सोनपानि
कोइ नाउँ, ढरम कमाइ लग बन्टि बा डानि
बरा गजबके लागल यि कलजुगके डुनियाँ,
कोइ रहरसे कोइ करसे बेच्टि बा जवानि ।
४. जाइटो मने मोर चिठ्ठि सब फारके जाउ
जट्रा फें रिस हुइ सारक सारा झारके जाउ
टोहाँर बिना केकर लग जिना यि जिन्गि,
बिन्टि बा कस्टोक् यि ‘सत्य’हे मारके जाउ ।
५. टोहाँर लजरसे परेसान बा जिउ टिकापुर आके
अइसा मुस्कि मार डेलो हैरान बा जिउ टिकापुर आके
कइसिक सम्हारम मै यि मनहे, अपन घरे जाके
उ मोहनि रुपसे बेठेकान बा जिउ टिकापुर आके ।
६. असौंक साल टुटल छँपरा लावा खरले छाँब छोट्कि
मँजुरि ढटौरि कैके फेंन मोटा चाउर खाब छोट्कि
कबु हार ना मन्हाें टोहाँर सहारा मै मोर सहारा टुँ,
हमार मैगर मैयँक् गिट ओहे बुक्रम गाब छोट्कि ।
–कैलारी गाउँपालिका–१ मनाउ, कैलाली, हालः धनगढी
दहितके थारु भासामे झिर्खि मुक्तक संग्रह प्रकासिट बटिन् ।
साभारः लावा डग्गर त्रैमासिक, २०७३, बरस ७, अंक ३, पुर्नांक २७
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