सुनिल कुमार महतो
हमरा थारु
हमार भाषा, हमार रहनसहन
ठ्याक्के मोर बुबाक यङोछा नहिया ।
मोर बुबाक यङोछवा
बुबाक लजवा मत्रे हैने झाँपसिय,
हमार थारुक पहिरन,
चिनारी हँसे थारुक पहिचान फेनी
बोकले बणिय ।
धेवरी बिनेके, बेवाँ बिनेके,
डेली बिनेके, मछुवारी करेके
सबकर साक्षी हलीय मोर बुबाक यङोछवा ।
यमोसा मनावेके, दशैँयामा देवता खेलाएके,
सोहराइ मनावेके, खिचरा मनावेके
फगुवावामा सामत लेसे हँसे ठेकरा खेलाए
बुबाक यङोछवा फेनी सङही सङही जैय
मोर बुबाक साङे ।
याजुकालु बहुतजाना छोडदेलई यङोछा पेहेरेके
जसने पवनीयाह गगससई
हमारा मनोले पर, हँ ठिक वसने मोर बुबाक
यङोछवा फेनी गगससीय
मोर बुबाक पेहरले पर ।
गोरहर यङोछा याजुकालु,
मैलाके करिया देखेसिय
हमार थारुक चिनारी फेनी रसे रसे
भुलाईल जाइ बणई, बुबाक यङोछवासे
गोरहरी रङवा भुलाईल जाई नहिया ।
माडी–४, सिधुवा, चितवन
कवि महतो सिन्धुलीमे स्थायी शिक्षक बणई
प्रकाशित:
३१३ दिन अगाडि
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२१ कात्तिक २०८२
१८ घण्टा अगाडि
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२९ भदौ २०८३
२ दिन अगाडि
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