नन्दक ओरग्यान
"ताेरा ढाैवा बेसी भेल छाै ?"
खिसया उठलै बुधना कका
आई अनगुतिये पराते
कारण हम नै जानलियै तत्काले
जे, खिसयाल छै कथिले हमरमे ?
"खाद्द किनैले ढाैवा नै छै"
"आ, ई बेहरीमे ढाैवा बाँटने फिरैछै"
यतेक कहलाके बाद हम बुझलियै
पितियाके बातके परख करलियै
जे, कका खिसयाल छै कथिले हमरमे ?
"बेहरी माङैछै दु हजार"
"त, ई दै छै पाँच हजार"
"यकरा ढाैवा बेसी भेल छै"
"भेल छाै ढाैवा बाैहतेक, त ला हमरा"
"हम किनबै धाेती-कुर्ता"
"जितिया मेलामे पिन्हैले"
साराके सारा बिख उताइर देलकै
कका आई बड गरम्याल छै हमरमे।
तखने पराेसिया दुखिया से हाे
चक्की चरह्या देलकै
"हँ हाै बबा, ई त गेन मे से हाे देलकाै ढाैवा"
"सात हजार"
कका के रिस त टिकमे चैढ गेलै
"ई त घरके बरबाद कैर देतै"
"सैब सम्पति यहै सबमे उरा लेतै"
सैब भडास निकाइल देलकै हमरमे।
अखारही थान पूजा आ जितियामे
गाममे सैब घरसे उठैछै बेहरी
अगुवा पहुँचैछै सैबके देहरी
आपन संस्कृति, संस्कार आ
बबा पुर्खासे चलैत याल चलन
दुनिया रहै तक, जियत राखैले
ई जिम्मा याल छै हमरमे।
पुर्खाद्वारा चलल हरेक चलन
जीवन दर्शनके चियै अनमाेल वचन
भेटैछै अईमे जिनगी जियैके रस्ता
हम रही या नै रही
ई चलन आ संस्कार जियत रहे
तें हम बढह्याके दै चियै बेहरी
सैब साल, ता कि
आपन संस्कार, संस्कृति आ चलन
चलैत रहाे सालाे साल
ई साेंच याल छै, आई हमरमे ।
हम रही या नै रही
चान-सुरूज रहै तक, ई संस्कार
सब दिन रहाेक
ई गिठरी बान्हल गेलछै हमरमे
यहन दशगर्जा चलनके मादे
रहैछै याद आ आशिर्वाद, बबा पुर्खाके
काेई किछ कहाे
ई चलन छै महान हमर नजरमे
ई संस्कार जारी छै हमर नगरमे
सब दिन जियत रहाे, हमर गामघरमे ।
जय जितिया, जय जित महान ।
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