फोटुः भरतविक्रम शाह
दिलबहादुर चौधरी
जब अङ्ना म डौना ओ बेबरी फुलल डेख्टुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा
जब बठ्न्यावन झौँ झौँ पैयाँ लागट डेख्टुँ ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा
हो भारी संस्कृति ब्वाकल् हमार थारु जात, नाचगान म रमिता कर्ना
जब चक्डाउ चक्डाउ मन्ड्रा बाजट सुन्ठु ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा
डिउँटावन छाँकिबुंडी डेहक लाग डारु बनइना, हमार पुरान रिति हो
जब डाइहँ गुम्रक डारु जोटाइल डेख्टुँ ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा
चाडबाडके ब्याल म हमन थारुन हँ सिढ्रा, मच्छी अनिवार्य चहठा
जब मामा घरक् माइ हँ सिढ्रा सुखाइ्ट डेख्ठुँ ट डस्या आ गिल् जसिन लग्ठा
आब डस्या आइ्टा लौव लुगा लगाइ पैम कना, म्वार खुसिके सिमा नि रह
जब डज्र्याव डसिहाँ जरावर सियट डेख्ठुँ ट डस्या आ गिल जसिन लग्ठा
कैलारी गाउँपालिका–५, कैलाली
हालः रानीवन, काठमाडौं
२०८२ भदौ २८ गते, ठुम्रार साहित्यिक बखेरी अंक १०८ मे जुमसे वाचन करल रचना
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