दिपक चौधरी असीम
नैचाहि सोना चाँडि महिन मैयाँ कैना मन हुइलेसे
उहे मन मन्डिलमे मैंयक् बख्खारिक् ढन हुइलेसे।
रुप्या पैसा व सुग्घर रुप एक समान कह्ठै सब्जे,
जाट्टिसे आझ बा काल्ह नैहो माटिक् टन हुइलेसे।
ना लेके अइनुँ ना लेके जैबुँ इ मटलबि डुनियाँसे मै,
सङ्गे आइल अपन पिंजराफेँ छोर्जिम मरन हुइलेसे।
बचन कान सुनट् मारलसे भारि चोट मुटुम लागट्,
आँखिसे आँस बहट् छाटिक भिट्टर जलन हुइलेसे।
माटिक् सरिर माटिम मिल्जाइट पटै बा सब जहन,
आत्म उर्जाइट् डेंह लास ओर्हाइल कप्फन हुइलेसे।
जन्मना मुना प्राकृतिक नियम नाउँ अमर हो जाइठ्,
कौनो मजा कर्म सुन्डर कृटि व मिठ बचन हुइलेसे।
कैलारी–२ बसौटी, कैलाली
प्रकाशित:
१२३८ दिन अगाडि
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१४ वैशाख २०८०
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