दिपक चौधरी ‘असीम’
बुधरामके परडेस कमाइ गैलक् ढेर डिन हो गैल रहिस्। लगभग लगभग ढाइ बरस। डस्या लग्गे आगिल रहे ओ बुधराम असौक् डस्या अपन घर परिवारन् सङग मनैना बिचार कैले रहे।
एक डिन बुधराम अपन घरे फोन करल। फोन ओकर जन्नि उठैलिस। डुनुजाने लम्मा समय सम सुखडुखके बाट बट्ओइल ओ बुधराम कहल, असौं डस्या माने घरे आइटु हो बड्डि।
टब बड्डि कलिस, लर्कन लग डसैंह्या लुग्रा लेले अइहो । सालो कठैं लर्का बाबा आइटे लावा झुल्वा घालब न डाइ।
हाँ हाँ लेके यैम् कहल बुधराम।
टब जन्नि कलिस, कह्या पुग्बो घरे ? डस्यक् डुइचार डिन आगे आ जिहो।
हेर बड्डि बिचार टे ओहे हो । मनो नै सेकम टे ढिक्रह्वक् डिन भर पक्कै पुगम् कहल् बुधराम । डग्रा हेर्टि रहहो आउर डिन नै हेर्लेसे फेँ ढिक्रह्वक् रोज कह्टि फोन ढैडेलस् ।
हप्टा कर्टि कर्टि डस्या फेन घर अंगना डुवारि डुवारि करे लागल। खेट्वम् लहर लहर ढानेक् बाल झुले लागल । गाउँ गाउँ मन्ड्रा बोले लागल। अहा कट्रा सुहावन कट्रा चम्पन ।
आझ ढिक्रह्वा । सक्कारेसे लर्का लावा लावा लुग्रम् डेखा परटैं । मनौ बुधरामके लर्का भर लावा लुग्रक् अस्रामे बिल्गठैं। मनौ बुधरामके जन्नि आझ बरा सजल सप्रल बिल्गटिस, माठेम टिक्लि माँगेम सेंडुर हाँठेम चुर्या कानेम बालि नाकेम फोंफि ढेब्रेम लालि एकडम लावा डुल्हि हस।
डुपहर हो गिल, मनौ बुधरामके अटापटा नै हो। लर्का इ घर से उ घर कर्टि खेल्ठैं। बुधरामके जन्नि डग्रा हेर्टि रठिस।
साँझके चार बज्गिल बुधरामके बाबा खोर्यम जाँर, डोन्यम सिढ्रक टिना लेके मिझ्नि खाइ बैठल रहिस्। डाइ जुन हुँक्का पिअट रहिस्। टब बुधरामके बाबा कलिस्, पटुहिया छावा अइना सुन्टहु, अभिन नै आइल ?
अट्रेमे डाइ कहलिस् ‘अरे टोहार छावा नै आइ जिट्टि मुइ टब आइ।’
टब बाबा कलिस् ‘अरि बड्डि टैं सुभ सुभ टे बोलिस्। कब्बु मजा बोलि नै सुन्बो। अइम टे कहटेहे पटुहियक् ठे मै सुन्नु टब पुछटु।’
अस्टे अस्टे बाट चल्टि रहे टिनु जहनके बिच, टबे मोटरके आवाज अङ्गनामे सुनाइ डेहल ओ बन्ड हुइल।
टब बुधरामके बाबा कलिस् ‘जा टे पटुहिया हेर, कसिन मोटर आइल ? छावा आइल कि का ?’
बुधरामके जन्नि अङ्गनाम निकरलिस् टब डैबर्वा मोटरमसे उटर्टि पुछल, बुधरामके घर हो इ ?
हाँ कलिस् बुधरामके जन्नि।
टब डैबर्वा कहल, ठारु मनै नैहुइटैं ?
–बटैं नि का ।
बाबा कहटि बलैलिस् अपन ससुर्वै बुधरामके जन्नि।
का हुइल कहटि बाबा बाहर अइलिस्।
–ए अप्ने बाबा हुइ बुधरामके बाबा ?
–हजुर
–लि एहोर आइ इ कागजमे साइन करि ।
–मैं साइन करे नै जन्ठुँ ।
–ए लि टे अँङग्रिक् छाप लगाइ ।
–का चिजिक छाप लेहटि ।
छाप लग्वैटि मनैंया कहल, अप्नेक छावक् लास बुझैना ।
अट्रा बाट सुन्के बाबा मुर्छा परगैलिस । बुधरामके लास मोटर मसे उटरलिस ओ मोटर चल्गैल।
घरमे रुवाबासि मच्गैल।उ सजल सप्रल पटुह्यक् हाँठेक चुर्या फुट्गैल माँगेक सेंडुर पोछ्गैल ।
बुधरामके संगेक संघरियाहे बुधरामके बाबा पुछ्लिस, इ सब कसिक् हुइल भैया ?
–कसिक् बटाउँ बरापु । घरे आइक लग हम्रे टिकट कटाके रेलक बङ्के पंज्रे बैठल रहि । अट्रेमे रेल आइल । हम्रे रेलम चहुरे जाइटहि कि रेल नेङडेहल, डाडुक हाँठ छुटगैलिन ओ गिर पर्लैं । टब इ घटना हो गिल।
सङगे खेल्ना सङगे रमैना सपना टुट्गैल।
हाँठेक् चुर्या टुटल माँगेक सेंडुर पोछ्गैल।
कसिन करम लिखल कौन डिन भगन्वाफेँ,
नच्ना गैना झुम्टि हँस्ना डस्याफेँ डसा बन्गैल।
इ खिस्सा काल्पनिक हो किहुसे मेल खाइ टे संजोग सम्झबि।
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