थारू साहित्यम दाङ देउखरके उपस्थिति
२५२ दिन अगाडि
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७ असोज २०८२
के.बी. चौधरी
गोंरी डराइ
नेपाल सांस्कृतिक विविधता रहल देश हो । फरक फरक भूगोल म रहल मेर–मेह्रिक संस्कृति देशके सम्पत्ति हो । राष्ट्रके पहिचान ओ गौरव हो । यिह मेर–मेह्रिक संस्कृतिले सुग्घर ओ चम्पन बनल फूलर्यम फुलल सुग्घर वासनादार, मल लल्चैना, मैया लग्टिक एक्ठो फूला हो थारू संस्कृति । खास कैख नेपालम तराई क्षेत्रक् सभ्यताहँ जीवन्त बनैना थारू संस्कृति भित्तरके मूल आयाम थारू साहित्य हो । थारू साहित्य क्षेत्र व्यापक, भारी चाक्कर ओ ओत्रहँ गहिर फे बा । थारू लोकसाहित्य भित्तरके गीत, संगीत, नाच हमार धरोहर हो । हमार समाजम लोक चलन चल्टिम रहल यी हमार मौलिक साहित्य हो । हमार जिन्गी, अवस्था, अनुभव अनुभूति, सामाजिक विकृति–विसंगति, विकास ओ प्रगतिहँ उजागर कर्ना खालक साहित्य फे सिर्जना हुइटी रहल अवस्था बा । ओसिन ट थारू साहित्य भित्तर दाङ जिल्लाके फे सशक्त उपस्थिति बा । थारू साहित्यहँ मलजल कैख बह्रैना, पांैह्रैना, स्याहार–सुसार कैख विकास कर्ना कामम दाङ डेउखरके महत्वपूर्ण भूमिका बटस कना विषयम कौनो दुई मत नि हो । यी आलेखम थारू साहित्यम दाङ डेउखरके योगदानहँ छोटकरीम चर्चा कइ गइल बा ।
खास कैख थारू साहित्यक विकास ओ विस्तारके लाग दाङ जिल्लम स्थापित हुइल साहित्यिक संघसंस्थाके बारेम कुछ व्याख्या करना, दाङ जिल्लासे हुइल विधागत प्रकाशन ओ प्रतिनिधि लेखक साहित्यकारके योगदानह उठान कर्ना उद्देश्यले तयार कैगिल हुइलसे फे यी आलेख तयार करबेर रहल ओ आइल सीमाह मध्यनजर कैख सामान्य विश्लेषण कइ गइल बा ।
परिचय
थारून्हक आदिमूभि, उत्तरओर महाभारत ओ डख्खिनओर चुरे पहारके बीच्चम रहल सुन्दर उपत्यका हो, दाङ जिल्ला । भौगोलिक हिसाबले दाङ ओ डेउखर क्षेत्र छुट्याइल बा । यी क्षेत्रम थारून्हक लाखौ बर्सक इतिहास, सभ्यता बा । समाज विकासके क्रममा विभिन्न उतारचढाव भ्वागल ओ ड्याखल दाङ क्षेत्रम आब फे करिब ३० प्रतिशत थारून्हक जनसंख्या डेख्परठ । ओस्टक क्षेत्रीन्हक २४.९० प्रतिशत, मगरन्हक १३.५९ प्रतिशत, बौनन्हक १०.२४ प्रतिशत ओ बाँकी अउर जातिन्हक जनसंख्या बा । आबक स्थितिम दाङह पूर्ण साक्षर जिल्ला कैख घोषणा कैगिल बा । थारून्हक आपन खालके सुशासन पद्धति, विकास निर्माण ओ सांस्कृतिक चाल चलन डेख्परठ । दाङ जिल्लाह प्रगन्ना, डेशबन्ढ्या, महटावाँ ओ गरढुर्या प्रणालीमार्फत् शासन कैगिल इतिहास बा । थारून्हक गौरवशाली ओ समृद्ध इतिहास रलसे फे आब सामाजिक रुपमा अपहेलित, आर्थिक रुपमा पच्गुरल, राजनीतिक रुपम हिगारगैल अवस्थामा थारून चित्रण कर्लसे फे सुस्त–सुस्त व्यापक सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनओर आघ बह्रल अवस्था बा । परिवर्तनके क्रमम डेख्परल विकृति ओ विसंगतिहँ व्यवस्थापन कर्टी हमार समाजिक विकासह गतिशील बनैना सक्कुन्हक दायित्व हो । थारून्हक समग्र सभ्यता ओ विकासम ऊर्जा गति ओ दृष्टि डेना कामम थारून्हक साहित्य फे महत्वपूर्ण भूमिका डेख्परठ । थारून्हक लोकसाहित्यमा रहल कला दर्शन ओ आदर्श याकर प्रमाण हो । ओसिन ट हमार बीचम बहुट लेखक, साहित्यकार हुँक्र विविध विषयम आपन किताब लेख रचना फे छपारख्ल । बहुट मेह्रिक अउर प्रकाशन फे आइल बा । याकर इतिहासहँ हम्र सम्झही पर्ठा ।
लेखक के.बी. चौधरी
दाङक थारू साहित्यक इतिहास
हमार लोक साहित्य थारू साहित्यक जग हो । हमार बीचम रहल गुर्बाबक जर्मौटी, फुल्वार, राम विहग्रा, सख्या, बर्किमार, सजना, मैना, ढुम्रु, झुम्रा, हुर्डुङ्ग्या, मघौटा, ख्याल ओ जत्रा फे अउर गीत, नाँच, बत्कोही, मन्तर, थारू साहित्यहँ गम्हिर ओ ढनि बना राखल । ऐतिहासिक ओ सामाजिक दृष्टिकोणसे याकर अध्ययन अनुसन्धान हुइ पर्ना जरुरी बा ।
थारू साहित्यक यी प्रवाहम जर्मल, पौंह्रल ओ यिहींहँ सवाँरल सक्कु थारू गुर्बाबाहुकन्हक योगदानहँ कदर ओ सम्मान बा । यिह जगम ठह्र्याक आपन साहित्यिक चेतना प्रस्तुत करुइया दाङक बढवा थारू (२००७) म ‘बढक्क जोर्नी’ किताब छपाइल इतिहास भेटाजइठा (पंजियार–२०५५) । ओस्तक कृष्णराज सर्वहारी (द्यष्दष्यिनचबउजथ या क्ष्लमष्नभलभयगक भ्तजलष्अ त्जबचग) कना किता भित्तर ‘थारू भाषा साहित्यमा उतार चढाव’ कना लेखम, २०११ सालमदाङसे जो जीवराज आचार्य ‘हम्र ओ हमार बन्वा’ कना किताब निकर्लसे फे यि दुअ किताब अप्राप्य रहल उल्लेख कैरख्ल ।
ओसिन त २०१६ सालम रुपलाल चौधरी ओ बद्रीनाथ योगी दाङसे जो ‘दङ्गीशरण कथा बर्किमार, गुरबाबक जर्मौटी’ कना किताब सबसे पैल्ह छपाक आपन गौरवमय इतिहास कायम करल बात बट्वागैल बा (७)।
असिक ह्यारबेर हमार साहित्य नम्मा समयसम अलिखित ओ मुखाग्र रहल देख्परठ । बहुट समय पाछ हमार समाजम अउर गुर्बाबन्हक जरम हुइल त केल याकर संकलन ओ प्रकाशन हुइभिरल देख्परठ ।
२०२८ म प्रगतिशील ओ जुझारु थारू युवा विद्यार्थी सशक्त रुपम थारू साहित्यके उन्नतिके लाग काम करल देख्जाइठ् । थारू साहित्यके माध्यमसे थारू समाजके विकास ओ प्रगतिक लाग महत्वपूर्ण लगानी ओ योगदान कर्ल । सचेत थारू विद्यार्थी युवा हुक्र गोचाली पत्रिका छपाख थारू साहित्यम सशक्त उपस्थिति देखैल । खास कैख महेश चौधरी, लालबहादुर चौधरी, सगुनलाल चौधरी, भगवती चौधरी, टेकबहादुर चौधरी, अशोक चौधरी जसिन थारू अगुवन्हक सक्रियताम थारू भाषा तथा साहित्य सुधार समिति संस्थामार्फत् गोचाली पत्रिकाके प्रकाशन ओ व्यवस्थापन कैगिल देख्परठ ।
प्रधान सम्पादक महेश चौधरी रहल गोचाली प्रत्रिका थारू समाजम रहल अन्धविश्वास कुरीतिके विरुद्धम केल नाही बल्की व्यापक रुपम शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचारके विरुद्धम, न्याय, समानता ओ समृद्धिके पक्षम आवाज बुलन्द पारल । पञ्चायतकालीन ऊ समयम थारू स्रष्टाहुँक्र जेल–नेल खैल । दुःख कष्ट पार कैख निरन्तरता पैटि रहल यी पत्रिका । यी पत्रिका सक्कु मिलाख १५ ठो अंक निक्रल कैख कृष्णराज सर्वहारी थारू पत्रकार संघके मुखपत्र फूलरिया भित्तर थारू म्यागजिन ‘गोचालीदेखि चली गोचालीसम्म’ कना आलेखम उल्लेख कैरख्ल (५) । असिक बहुटसे स्रष्टाहुँक्र ‘गोंचाली’ मार्फत् आपन सिर्जना प्रकाशित कैख समाजहँ मजा डग्गर डेखैना काम कर्ल । उहमार ‘गोचाली’ पत्रिका एक्ठो महत्वपूर्ण कालखण्डह प्रतिनिधित्व कैख थारू साहित्य भित्तर आपन बल्गर इतिहास बना राखल । सयौं लेखक, साहित्यकार जर्माइल, यी पत्रिकाहँ हमार सम्मान बा । गोचालीह २०५२ सालम कविवर श्री युद्धप्रसाद मिश्रज्यूक पूण्य स्मृतिम रहल ‘युद्धप्रसाद मिश्र स्मृति पुरस्कार’ले सम्मानित कैगिल ।
२०३९ सालम दाङसे जो महेश चौधरी ‘बर्किमार’, ‘गुर्बाबक जर्मौटी’ ओ २०४० सालम ‘छारा’ गीति नाटक प्रकाशन कैख थारू साहित्यहँ महाभारी गुण लगैल ।ओसिन त सामाजिक सचेतना जगैना छारा गीति नाटकहँ गाउँ–गाउँ पैलहें देखागैल रह । २०२१ सालम भूमिसुधार ऐन लागू हुइल ट गाउँगाउँसे मनै बुह्रान जाइलग्ल ट यी गीति नाटक सक्कुन्हक मन जिटल ।
असिक पञ्चायतकालहँ थारू नाटकके स्वर्णकाल कैख सुशील चौधरी चलि गोंचाली मासिकभित्तर ‘थारू लोक जीवन र कला एक विमर्ष’ आलेखम उल्लेख कैरख्ल (३३)। अत्रकेल नाही, गैरथारू समुदायसेदाङबर्गद्दीक नारायणप्रसाद शर्मा थारू भाषम कलक चलाख थारू समाजहँ झक्झोर्ना प्रयास कर्लकैख ‘गोचाली’ अंक १५ वर्ष ३६ भित्तर “गोचालिक ऐतिहासिक झलक” कना आलेखम जग्गुप्रसाद चौधरी लिख्टी हुँकाहार कविता समेत उल्लेख कैरख्ल ।
असिक बहुटसे स्रष्टाहुँक्र ‘गोंचाली’ मार्फत् आपन सिर्जना प्रकाशित कैख समाजहँ मजा डग्गर देखैना काम कर्ल । उहमार ‘गोचाली’पत्रिका एक्ठो महत्वपूर्ण कालखण्डहँ प्रतिनिधित्व कैख थारू साहित्य भित्तर आपन बल्गर इतिहास बनाराखल । सयौं लेखक, साहित्यकार जर्माइल, यी पत्रिकाहँ हमार सम्मान बा । गोचालीहँ २०५२ सालम कविवर श्री युद्धप्रसाद मिश्रज्यूक पूण्य स्मृतिम रहल ‘युद्धप्रसाद मिश्र स्मृति पुरस्कार’ले सम्मानित कैगिल ।
असिक दाङ म थारू साहित्यके जग बल्गर हुइटी गैल, तमाम अउर थारू साहित्यक संघसंस्था ओ मेर–मेह्रिक किताब जर्मल । जेहीम गोचाली (२०२८), हमार पहुरा (२०४९), कविला (२०५१), केरनी (२०५८), संघारी (२०५६), कविला (२०६०), जोग्नी (२०६१), लावा लौझी (२०६४), लौव अग्रसान (२०६४), लावा डग्गर (२०६६) लगायत पत्रिका प्रकाशन हुइ बा । इहमसे लावा डग्गर पत्रिका केल नियमित होक प्रेस काउन्सीलम ख वर्गमे वर्गीकरण हुइना सफल बा ।
ओस्हक दाङसे निक्रल पोष्टाम बेसके थारू नेपाली अंग्रेजी शब्दकोश ओ थारू भाषक लिरौसी व्याकरण, महेश चौधरीक बर्किमार, गुरुबाबक जर्मौटी, माँगर लोकगाथा छारा नाटक बा । बर्किमार रुपलाल चौधरी बद्रीनाथ योगी, बेस, चन्द्र प्रकाश चौधरी फे प्रकाशन कर्ले बाट । इह क्रमम गोकुल चौधरीक देउखरिया रतनचुवा, दिननचुवा गीत, भुवन भाइक आछत, बाल गोविन्द चौधरी, सुमन चौधरीक बैशालु जोवन, मंगल चौधरीक पहुरा, पुनाराम कर्याबरिक्काक अँख्वा गजल प्रकाशित बा ।
२०७३ बैशाख ३ ओ ४ गते दाङके घोराहीमे थारू साहित्यिक पहिल मेला २०७३ मे पोस्टा प्रदर्शनी
थारू भाषम् थारू छात्र संघ डेउखरसे श्री कृष्ण जन्माष्टमी गीत (२०२२), नारायण योगीके जनतनके गीत (२०४८), आइल रे में दिन गीत संग्रह (२०५१), गाउँ हमार होे गीत संग्रह (२०५६) निक्रल बा । कृष्णराज सर्वहारीक् फुटल करम उपन्यास (२०५५), डोसर घर जाइबेर मुक्तक संग्रह (२०५६), समयका उच्छबासहरु हाइकु संग्रह (२०५९), सुख्ली बालकथा संग्रह (२०६२), जोन्हु मामा बालकविता संग्रह (२०६३), २०६६ सालमे चारठो सचित्र बालकथा हर जोत्ना मछरिया, अनारकलीक् अन्तरकथा, तुलारामके चर्तिकला, सत्तलसिंहके कथा प्रकाशित बटिन । ओस्टक ढों ढों पों पों हाँस्य ब्यग्ंय संग्रह (२०६८), कमैया बस्तीमे भगन्वा लघुकथा संग्रह (२०७२) लगायत प्रकाशित बटिन । ओस्टक छविलाल कोपिलाक मुक्तिक खोज उपन्यास (२०५९) भौगर गजल (२०६१), कैले फुल्छ ऊ ? बाल गजल संग्रह (२०६३), चुरिनियाँ उपन्यास (२०६९), हमार संस्कृति (२०७१) ओ कोपिला सहित गुरुप्रसाद कुमाल ओ रामप्रकाश चौधरीके समयका डोबहरु संयुक्त मुक्तक संग्रह (२०७१), लगायत प्रकाशित बटिन । सुरेश चौधरीक तुहिन कविता संग्रह (२०६१), कामताप्रसादके जुग जुग जिओ गीत संग्रह (२०६३), जीवलाल सत्गौवाँक जीवलालके फुलरिया (२०६७), वीरबहादुर सत्गौवाँक वीरबहादुरके ऋतु (२०६९), सहयोग समाज नेपाल थारू हिज्जे, थारू सन्देशमूलक गीत, बुक्रीभारा, थारू भाषक बट्कोही संग्रह, अग्यारी, गन्यारी, थारू वर्णमाला लगायत पोष्टा निकारक गुन लगइले बा ।
गीति क्यासेटम दाङसे बुह्रान (बेझलाल चौधरी), दुल्हा घुमे मरुवा (पोखम चौधरी, धुपनारायण चौधरी, रामधनी चौधरी), केरनी (बेस दाङ) पहुँरा (मधुबाबु थापा), साली भाटु ओ राउत डमन्ड्वा (लक्ष्मीमान चौधरी) के बा । फिलिमम बुह्रान (थम्मन चौधरी, लक्ष्मीमान चौधरी), भूइह्यार (के.एल.पीडित), लाज (सुसन प्रजापति) बनल बा । डकुमेन्ट्रीम महटावाँ (केवि चौधरी, माधव चौधरी) के बा ।
दाङम खास कैख लोकसाहित्य अन्तर्गतके थारू लोक गाँथा बहुट ढ्यार संकलन कैगिल देख्परठ । महेश चौधरी, अशोक थारू, कृष्णराज सर्वहारी, डा.गोविन्द आचार्य जसिन विद्वान् लेखक, साहित्यकार, थारू लोकसाहित्य संरक्षण कर्ना कामम महत्वपूर्ण योगदान डेरख्ल । थारू साहित्यम दाङक सबसे बरा योगदान यिह हो । निरन्तरता निहुइसेक्लसे फे मेरमेह्रिक पत्रिका फे प्रकाशित हुइल हुइल बा । यी थारू संस्कृति ओ साहित्यम रहल दाङक रुची ओ चेतना उजागर कर्ठा । भाषाके संरक्षण ओ व्यवस्थापनके लाग आवश्यक पर्ना शब्दकोष, व्याकरण जसिन किताब यिहँसे छाप्गैल बा । उपन्यास, कथा, कविता लिख्ना ओ छपैनाम बहुट कम स्रष्टाहँुक्र सक्रिय बाट । खास कैख दाङसे असिन विधाम लिखुइया महेश चौधरी, अशोक थारू, कृष्णराज सर्वहारी, छविलाल कोपिला, शेरबहादुर चौधरी, श्रीराम चौधरी ओ भुवन भाइ ससशक्त हस्ताक्षर हुइट ।
ओस्टक बालगाविन्द चौधरी, रामप्रकाश अन्धकार, गुरुप्रसाद कुमाल बुलबुल, लक्ष्मीमान चौधरी, माधव अनुरागी, केबी चौधरी, प्रकाशप्रिय कुसुम्या, शालिकराम सौगात, सन्तोष दहित, लब्लिन क्यानभास, रोशन रत्गैंया, राजकुमार कान्छा, हिमलाल चौधरी, नवीन चौधरी, विनोद संगम, पुनाराम कर्याबरिका, सीता दहित, संगीता चौधरी भारी मज्जा सम्भावना ब्वाकल युवा साहित्यकार हुइट । आबक अवस्थाम दाङ जिल्लासे केबी चौधरी प्रधान सम्पादक ओ सन्तोष दहित प्रकाशक रहल लौव अग्रासन साप्ताहिक लगातार ३ सय ३४ अंक प्रकाशित हो स्याकल बा । दाङक हर्चाली साहित्य समूहके साहित्यिक अभियान एक्ठो उदाहरणीय काम हो । केबी चौधरीके संयोजनम माधव अनुरागी, सन्तोष दहित, शालिकराम सौगात, प्रकाशप्रिय कुसुम्या, अशोक चौधरी, लब्लिन क्यानभास, राजकुमार कान्छा लगायतके गोचालिन्हक सक्रियताम शुरु हुइल साहित्यिक शृंखला १२ ठो भाग पूरा हो स्याकल बा ।
ओसिन ट हमार समुदायम हरमनै थारू लोक गीतसे परिचित रठ । पुरान चिजहँ खेर्ख प्रकाशन कर्ना ओ लौव सिर्जना करुइया क्रियाशील स्रष्टाहँुक्र यिहाँ बहुट बट । सक्कुन्हक उपस्थितिहँ बल्गर बनाइपर्ना जरुरी बा । खास कैख अनुज लेखक साहित्यकार हुकन्हक भूमिका कलक साहित्यक दिशा निर्देश कर्ना ओ उदयमान प्रतिभा हुँकन साहित्यिक वातावरण बनैना काम म सहयोग कर्ना हो । यी क्षेत्रमा कलम चलुइया लौव स्रष्टाहँुक्र आपन साहित्यक ज्ञान ओ कलाहँ टिस्लर्टी जैना हो कलसे दाङसे थारू साहित्यिक विकासम आम्ही भारी योगदान पुग स्याकठ् ।
निष्कर्षः
दाङ थारू साहित्यक केन्द्र हो । थारू साहित्यक अगुवा संस्था ओ स्रष्टा यिहाँक माटिम साहित्यिक फूलर्या बनारख्ल । थारू साहित्य प्रकाशनके काम यिहींसे शुरु हुइल । थारू साहित्यके अगुवा बरिष्ठ साहित्यकार महेश चौधरीसे लेक, सशक्त ओ क्रियाशील युवा साहित्यकार राष्ट्रिय छवि बनास्याकल कृष्णराज सर्वहारी दाङसे प्रतिनिधित्व कर्ठ । बहुट मेह्रिक लोक–साहित्य, शब्दकोश, व्याकरण ओ सिर्जनात्मक साहित्यक विधाम दाङसे प्रकाशित कृति, समग्र थारू साहित्यम विशिष्ट ठाउँ बनैल बा ।
थारू साहित्यिक अभियान चलैना मेह्रिक हर्चाली, लौव अग्रसान, लावा डग्गर जसिन संस्था दाङम क्रियाशील रलसे फे स्वाँचल अनुसार गुणात्मक साहित्यिक विकासके काम कर निसेग्गैल हो । तमाम छिट्कल स्रष्टाहुँकन एकजुट कराइ निसेक्गैल यथार्थ बा । साहित्यिक गतिविधिहँ डान्चे घन बनाइपर्ना जरुरी बा । याकर उन्नयनके लागसरकारी, गैरसरकारी संघसंस्थासे कुछ लगानी हुइपर्ना जरुरी बा । राजनीतिक कारणसे आइल विभाजनहँ समेत छोर्क थारू साहित्यक पक्षम,सक्कुज एक होक काम कर पर्ना आझुक आवश्यकता हो । राजनीतिक अधिकार स्थापित कर्ना सन्दर्भम समेत याकर महत्वपूर्ण भूमिका हुइ सेक्ठस् । थारू भाषाके प्रयोगहँ दैनिक जीवनम ओ औपचारिक शिक्षाम बेल्सपर्ना आवश्यकता बा । थारू भाषा जत्राढेर बेलस्गैल ओत्रह ढेर थारू साहित्यके सिर्जना हुइस्याकट कना म्वार विश्वास बा । अन्त्यम सक्कु ज्ञात–अज्ञात थारू साहित्यके गुर्बाबाहुँकन सम्मान व्यक्त कर्टी थारू साहित्यम दाङक महत्वपूर्ण योगदानहँ कदर कर चाहटुँ ।
सन्दर्भ सामग्री
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थारू भाषा तथा साहित्य संरक्षण मञ्च तथा हर्चाली समूहके आयोजना एवम् नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानके सहकार्यमे २०७३ बैशाख ३ ओ ४ गते दाङके घोराहीमे थारू साहित्यिक मेला २०७३ मे प्रस्तुत कार्यपत्र ।
(नोटः इ पेपर ९ बरस पहिले लिखल ओर्से लावा तथ्य समावेश नइ हो)–सम्पादक
अनुवादः सत्यनारायण दहित