बुडुक चिन्हा

बुडुक चिन्हा

१५ घण्टा अगाडि

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१९ जेठ २०८३

का जात्तिक परिवर्तन आइल ट गाउँम ?

का जात्तिक परिवर्तन आइल ट गाउँम ?

४ दिन अगाडि

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१६ जेठ २०८३

विक्रम विरहुल हुना ट उह डग्रा हो आझ फे तर अलकत्रा लगाक  उह डग्रा म्वार झोँफ्रिसम् पुगल बा हुना ट उह खोल्ह्वा हो डिन्का नहङ्ना तर उह खोल्ह्वम  ल्वाहक पुल बनाइल बा आझ ।   आझ फे भुवर बिहानम  म्वार बाबा निक्रठ पोकल्लि भात खैटि जुवामा भैंस जुट्याक जिम्डर्वक खेट्वा ज्वाट कमैया नि हुइट बाबा जिम्डर्वक घर  तर कामदार बनल बाट ना ट शोषित हुइट जिम्दर्वसे, ना ट स्वतन्त्र फे खोल्ह्वा नाङ्घ सजिल बनल बाटिन बाबाहँ तर जिन्दगिक खोल्ह्वा नाङ्घ सजिल कहाँ बाटिन ? पक्कि डगरम नेङ्ना सजिल बाटिन् तर जिन्दगिक डगरम नेङ्ना सजिल कहाँ बाटिन् सक्कुजे कठ गाउँम परिवर्तन आइल बा का जात्तिक परिवर्तन आइल ट गाउँम ?   हुना ट बाबा उह हुइट आझ फे बा...बा तर आझकल बाबा ‘ड्याड’ बनल बाट हुना ट मन्डरा उह मेरिक हो आझ फे तर ब्वालबाजि मन्डरम  भ्वाङ् परल असक लागट गिटबाँस उह मेरिक ट हुइट आझकाल फे तर गितम मै जिन्गिक स्वाद नि पैठु आझ कहाँ बा हमार सजना, मैना कहाँ बा चलन ढुम्रु गैना पहर्ना ट पहर्ल आझुक लर्कावन्  तर का पहर्ल ? आझकल बरा बरा घर बनल बाटन् गाउँम तर घरम बैठना मनैय नि हुइट डाइ डिन गन्टि बैस्ठि पिखाँहिम छावाक अस्रा लाक्खन थाह नि हो  छावा बक्सम खुसि लेक अइठा कि अप्नहँ बक्सम अइठा ? सक्कुजे कठ गाउँम परिवर्तन आइल बा का जात्तिक परिवर्तन आईल ट गाउँम ?   बर्दिया –१, खोदाऊ हालः पोखरा सम्पर्कः ९८२२४७७१३४

बाबक जस्ट छावा

बाबक जस्ट छावा

६ दिन अगाडि

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१४ जेठ २०८३

                                                                                              कवि  कृष्ण समर्पण बाबा, टुँँ नै बोल्ठो ढ्यार, तर टुँहार गुम्मरपन म, म्वार भविष्य नुकल बा टुँहार आँक्खर हाँठम, म्वार जिन्गिके सुरक्षा बा टुँहार आँखिम,  नै बोल्लक हजार सपना बा टुँ दुःख अप्नेह ढर्लो, महिन मुस्कान डेक टुँ डट्करके फे कब्बु नै बिसैलो, का कर कि म्वार अइना काल्ह  टुँहार आझसे बहुट बरुवार रह मै न्याँग बेर गिरजैठुँ,  तर उठ्ना आँट अप्नेसे सिख्ल बाटुँ मैं अप्नेक जस्ट बन ट नै सेकम तर अप्नेक ईमान, धैर्य ओ सहास म्वार रगतम डौर्टि बा मै नेँग्टि बाँटु मनै कठ– ‘बाबाक जस्ट छावा’ हुँकिन का पटा एम्न एक्ठो जिन्गिके त्याग और जिन्गिके आस अट्रा गहिंरक नुकल बा हुँकिन का पटा म्वार नेङ्ना आँट, अप्नेक अधुरा जिन्गिसे अइलक हो मै कब्बु कमजोर डेखैम कलसे बाबा, महि माफ कर्डेहो, का कर कि बल्गर हुइना कलक, अप्नक जस्ट चुपचाप सहना हो।    बारबर्दिया नगरपालिका, बर्दिया हालः कीर्तिपुर, काठमाडौं सम्पर्कः ९८५७८७९९९९

 बिचारा किसान 

 बिचारा किसान 

७ दिन अगाडि

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१३ जेठ २०८३

रुमा चौधरी   महीँ टे इ डेसके असली  हिरो  किसान हुइट जस्टे लागठ। जिही न घाम के पटा रठिन, न टे बर्खा के डर, बस उब्जनीके आसमे घाम पानी बिन हेरल अपन काममे राटो डिन डटल रठाँ। उहे किसान, जे आपन घर चलाइक लग   डिन राट मेहनत कर्ठा अट्रे किल नाही,  पूरा देशके पेट भरक लग हरडम पस्ना बहैटी रठाँ उहे किसान,  महँगा बिया बालर, मलखाद  मोल लेके खेटी टे कर्ठा मने अपन लगानी फिर्ता आई कना भरोसा कभु नै कर्ठा ।  कबो बाह्र, कबो सुख्खा, आउर जहन खवाके अपने भुख्खा सक्कु परिस्थितिसे जुझे पर्ठिन किसानहे, महँगाईके बोझा  सडा डिन बोक्टी रठाँ किसान  खेट्वामे डिन भर पसना चुहैटी, मेहनट कैटी रठाँ, मजा उत्पादन डेखके मन फोहैटी रठाँ । लेकिन,  जब बजार जैठाँ  मजा भाउ नै पैठाँ, टब किसान डुखी हुइटी  घर लउट जैठाँ ।  लेकिन किसानके पीड़ा बुझक लग कोई आगे नै बह्रठाँ । बिचारा किसान, जट्रा मिहनेट करलेसे  सबओर घाटेघाटा  अभिन बजारमे बिन बुझल कनैं एक मुट्ठा सागमे मोल भाउ करठाँ। किसान मेहनत कैके सबके पेट पल्ठाँ लेकिन दुःख टब लागठ जब जागिरे, धनीमानी मनै खेटी कैके काम नै हो, कहिके किसानहे हेप्ठाँ। बिचारा किसान । हाय रे किसान । राप्ती गाउँपालिका–८, पिपरी  दाङ देउखुरी  

मैं इ देशके धर्तीपुत्र 

मैं इ देशके धर्तीपुत्र 

१० दिन अगाडि

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१० जेठ २०८३

                                                                                        तस्विरः कुलदीप न्यौपाने इन्द्र चौधरी   जब जब देश परिवर्तन खोजठ टब टब मोर खोजी हुइठ लेकिन,  परिवर्तन पाछे शासकसे  जब मैँ आपन अधिकार मङ्ठुँ  टब ऊ कहठ, “टैँ के हुइस् ?” प्रश्न सुन्के मनमने कठुँ  “राणा शासनविरुद्ध लरुइया मोर पुर्खन बिस्रा डर्लो ? प्रजातन्त्रके लाग लरुइया मोर बुडी बुबन बिस्रा डर्लो ? अन्याय विरुद्ध लरुइया मोर डाइबाबन बिस्रा डर्लो ? लोकतन्त्रके लाग लरुइया मोर डिडी डाडुन बिस्रा डर्लो ? सुशासनके लग लरुइया मोर जेन्जी भैयाबाबुन बिस्रा डर्लो ? राट डिन सिमाके अख्वारी करुइया हमन बिस्रा डर्लो ?”  राज्यके आश्वासनसे  फाटल  जिन्दगी चब्डना सपना डेखुइया मैँ   हर जुगमे अपन परिचय डेटी आइल मैँ  आउर कसिक चिन्हाउँ ?  “मै ट सख्या, मघौटा, मुङ्ग्रहौवा नाच नच्ठुँ मागर, ढुम्रू, सज्ना, मैना गीत गैठुँ भेग्वा, चोल्या, लेहेङ्गा, गोन्या पहिरन घल्ठुँ मन्ड्रा, कस्टार, मन्जिरा, पिल्रु , बस्या बाजा  बजैठुँ अस्टिम्की, अट्वारी, डस्या, डेवारी, माघ टिउह्वार मन्ठुँ, ढिक्री, घोङ्घी, मच्छी, खेर्या परिकार खैठुँ, बरघर, गुर्वा हुँकन् गाउँ चलुइया ओ सम्रुइह्या अग्वा मन्ठुँ ।” आकुर जन्ना मन बा कलेसे   “सक्कु दलके घोसनापत्र हेरो, जनगणनाके तथ्यांक हेरो, संविधान धारा उपधारा हेरो, मै केवल,  सत्ता परिवर्तनके लाग लरुइया सिपाही किल नि हु ?  “मैं  ट यी  देशके  आदिवासी हुइटुँ                   जनजाति हुइटुँ     रक्षक हुइटुँ    सबके पेट भरुइया किसान हुइटुँ         मैँ ट यहाँके धर्तीपुत्र थारू हुइटुँ         धर्तीपुत्र थारू हुइटुँ।”    सम्पर्कः ९८४८४९६९८१  स्थायी ठेगानाः शुक्लाफाँटा नपा–१२, कञ्चनपुर  हालः कीर्तिपुर नपा– ९, काठमाडौ   

असमझदारी 

असमझदारी 

१० दिन अगाडि

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९ जेठ २०८३

हमर मन बौहतेक भारी छेलै कतहेक भारी से त हम नै तौल सकलियै लेकिन हाँसैले बिसैर गेलियै तोहर दिसर ताकैले बिसैर गेलियै यी कथि छेलै झगरा कि असमझदारी हम पता लगाइले नै सकलियै  हम तोहर गलति देखलियौ तु हमर गलति देखाइत रहलि गल्ती केकर छेलै  से बात नै पता लगाइले सकलियै  लेकिन   हम तोहरसे बोलैले छोइर देलियौ लेकिन हरदम तोहे हमर मनमे बैठल चिहि सायद नै देखाइले सकलियौ हम तोरा प्रेम हमर बाइने अइहनङ छै हम व्यक्त करैले नै सकैचियै  लेकिन हमर मनभित्र मे तोहरले बहौत प्रेम छौ । हम देखलियै चारूभरा दुर तक सोचलियै बहौत विचार करलियै तोहरमे येहेन कथि छौ से झगरा या मनमोटाब के बादमे भी  हम तोरेले तरपै चियै ?  रूसल फुलल रहै चिहि तेकर वाद मे भि हमर मन तोरेमे बैठल रहै छौ कथिले ? यी प्रेम चियै या झगरा कि मनमोटाब कि असमझदारी तहै बेरमे हमरा याद याल ऊ समय जै समयमे हम आर्थिक या मानसिक रूपमे लाचार छेलियै दरदर ठोकर खाइछेलियै  लोकसब देहरी बन कैर लेलकै  हमर मुहमे थुइक देलकै तैबेरमे तोहे दुनु बाइह फैल्या के हमरा  बान्हलिहि सहारा देलहि तोरे साथ से मानसिक या आर्थि रूपमे हम बलगर भेलियै तोरे साथसे संसार हमर पैरमे झुकलै  लेकिन छोटमोट झगरा के हम आइके दया देलियै नै निक रूप अइ असमझदारीके आइसे हम दैचियै प्रेमके रूप अइ मनमुटावके हम आइसे दैचियै स्नेहके रूप तोहे हमर बारेमे कथि सोचैचिहि  से हमरा थाह नै भेलै लेकिन हम तोरा सब दिन  आपन से अगारी राइखके सोचै चियौ । सायद अइहनङ अइहनङ बात समैझके हम तोहर अगारी झुइक जाइचियौ ।

थारुले के पायो ?

थारुले के पायो ?

११ दिन अगाडि

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८ जेठ २०८३

 भुवन भाइ   जसले नदीसँगै जीवन सिक्यो जसले वनसँगै सपना रोप्यो जसले माटोसँगै पसिना साट्यो  ऊ सधैं उहीँ रह्यो धर्तीको काखमा गहिरो गरी गाडिएको जराजस्तै हावासँग झुक्ने तर नटुट्ने बाँसझैँ । थारुले पायो, आफ्नै खेतमा अरूको नियम आफ्नै बारीमा अरुको कानुन आफ्नै माटोमा पराइको नाम आफ्नै गीतमा मौनताको आदेश । उसले पायो बाढीले बगाएको झुपडी विकासले छोएको नपुग्ने गाउँ र, अधिकारको नाममा  टाढा टाढासम्म पुग्ने आश्वासन मात्र । तर पनि थारु रोएन ऊ गुनासोको नदी बनेर बगेन ऊ अझै पनि मुस्कुरायो धानको बालाजस्तै  झुकेको तर हरियो । किनकि उसलाई थाहा छ माटो बेचेर होइन माटो सम्हालेर मात्र आफ्नो अस्तित्व जोगिन्छ आफ्नो पहिचान जोगिन्छ। त्यसैले, प्रश्न अझै बाँकी छ थारुले के पायो ? कि उसले अझै पनि आफ्नो अधिकारको सामाजिक न्यायको पहिलो अक्षर लेख्न बाँकी नै छ…!